29 Dec 2025
'ग़ैरों को कब फ़ुर्सत है दुख देने की...' नास्तिकता की बहस के बाद पढ़ें जावेद अख़्तर के बेहतरीन शेर.
ख़फ़ा ख़फ़ा
1. यही हालात इब्तिदा से रहे, लोग हम से ख़फ़ा ख़फ़ा से रहे.
काजल फैल रहा
उस की आंखों में भी काजल फैल रहा है, मैं भी मुड़ के जाते जाते देख रहा हूं.
दुख देने
ग़ैरों को कब फ़ुर्सत है दुख देने की, जब होता है कोई हमदम होता है.
अल्फ़ाज़ में पिरोने
अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी, हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का.
आस्तीं भिगोने
बहाना ढूंडते रहते हैं कोई रोने का, हमें ये शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का.
मैं भूल जाऊँ
मैं भूल जाऊँ तुम्हें अब यही मुनासिब है, मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूं.