05 Jan 2026
'वो जंगलों में दरख़्तों पे कूदते फिरना...' पढ़ें मोहम्मद अल्वी के बेहतरीन शेर.
मुक़द्दस किताब
मैं उस के बदन की मुक़द्दस किताब, निहायत अक़ीदत से पढ़ता रहा.
आंख
रखते हो अगर आंख तो बाहर से न देखो, देखो मुझे अंदर से बहुत टूट चुका हूं.
कूदते फिरना
वो जंगलों में दरख़्तों पे कूदते फिरना, बुरा बहुत था मगर आज से तो बेहतर था.
रौशनी को उतरते
हैरान मत हो तैरती मछली को देख कर, पानी में रौशनी को उतरते हुए भी देख.
उन दिनों
उन दिनों घर से अजब रिश्ता था, सारे दरवाज़े गले लगते थे.
बाज़ार
और बाज़ार से क्या ले जाऊं, पहली बारिश का मज़ा ले जाऊं.