15 Jan 2026
'वो हम से ख़फ़ा हैं हम उन से ख़फ़ा हैं...' पढ़ें शकील बदायूनी के बेहतरीन शेर.
ज़माने में मोहब्बत
जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का 'शकील', मुझ को अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया.
क़ैद-ए-मोहब्बत
मुझे तो क़ैद-ए-मोहब्बत अज़ीज़ थी लेकिन, किसी ने मुझ को गिरफ़्तार कर के छोड़ दिया.
दामन को बचा
काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर, फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ.
ख़फ़ा हैं
वो हम से ख़फ़ा हैं हम उन से ख़फ़ा हैं, मगर बात करने को जी चाहता है.
यक़ीन-ए-कामिल
चाहिए ख़ुद पे यक़ीन-ए-कामिल, हौसला किस का बढ़ाता है कोई.
पलट कर गुज़रा
तुम फिर उसी अदा से अंगड़ाई ले के हँस दो, आ जाएगा पलट कर गुज़रा हुआ ज़माना.
तर्क-ए-मय
तर्क-ए-मय ही समझ इसे नासेह, इतनी पी है कि पी नहीं जाती.
दिल की तसल्ली
काफ़ी है मिरे दिल की तसल्ली को यही बात, आप आ न सके आप का पैग़ाम तो आया.
जज़्बा-ए-ख़ामोश
क्या असर था जज़्बा-ए-ख़ामोश में, ख़ुद वो खिच कर आ गए आग़ोश में.