29 Jan 2026

'हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी...' पढ़ें मिर्ज़ा ग़ालिब के चुनिंदा शेर.

तुम्हीं उस्ताद

रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब', कहते हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था.

दिल भी जल

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा, कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है.

हमारी ख़बर

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी, कुछ हमारी ख़बर नहीं आती.

मुँह से जाओगे

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब', शर्म तुम को मगर नहीं आती.

फ़क़ीरों का हम

बना कर फ़क़ीरों का हम भेस 'ग़ालिब', तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं.

मुसाहिब फिरे

हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता, वगरना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है.

नींद क्यूँ 

मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यूँ रात भर नहीं आती.

दर्द-ए-बे-दवा

इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया, दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया.

सलामत रहो

तुम सलामत रहो हज़ार बरस, हर बरस के हों दिन पचास हज़ार.