31 Jan 2026
'बोतलें खोल कर तो पी बरसों...' पढ़ें राहत इंदौरी के दिल जीत लेने वाले शेर.
दोस्ताना ज़िंदगी
'एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो, दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो.
गीली ज़मीन
मैं पर्बतों से लड़ता रहा और चंद लोग, गीली ज़मीन खोद के फ़रहाद हो गए.
तिरे शहर
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है, उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते.
बोतलें खोल
बोतलें खोल कर तो पी बरसों, आज दिल खोल कर भी पी जाए.
हिमायत में ग़ज़ल
रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं, रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है.
छोड़ दूँगा
मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को, समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे.
तमन्ना भी बहुत
तुझ से मिलने की तमन्ना भी बहुत है लेकिन, आने जाने में किराया भी बहुत लगता है.
दुश्मनों में बस
मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूं, यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे.
पथराव रोक दें
ख़याल था कि ये पथराव रोक दें चल कर, जो होश आया तो देखा लहू लहू हम थे.