08 Feb 2026

'हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ...' पढ़ें साहिर लुधियानवी के दिल जीत लेने वाले शेर.

मोहब्बत निभा

अपनी तबाहियों का मुझे कोई ग़म नहीं, तुम ने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी.

 ज़ुल्म के ख़िलाफ

हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ, गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सही.

कोई इल्ज़ाम

तुम मेरे लिए अब कोई इल्ज़ाम न ढूँडो, चाहा था तुम्हें इक यही इल्ज़ाम बहुत है.

मोहब्बत से मोहब्बत

आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें, हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं.

मैं ज़िंदगी

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया.

ज़िंदगी ने दिया

इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ, जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से.

छोड़ के ठुकरा

तू मुझे छोड़ के ठुकरा के भी जा सकती है, तेरे हाथों में मिरे हाथ हैं ज़ंजीर नहीं.

तकल्लुम तिरी 

 मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूं, वो तबस्सुम वो तकल्लुम तिरी आदत ही न हो.

जंग क्या

जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी.