17 Feb 2026

'हम ने तो ख़ुद से इंतिक़ाम लिया...' पढ़ें सलीम कौसर के शानदार शेर.

फ़ासलों में क़ैद

क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं, कितनी आज़ादी से हम अपनी हदों में क़ैद हैं.

लिखते हुए दास्ताँ

कहानी लिखते हुए दास्ताँ सुनाते हुए, वो सो गया है मुझे ख़्वाब से जगाते हुए.

ख़ुद से इंतिक़ाम 

हम ने तो ख़ुद से इंतिक़ाम लिया, तुम ने क्या सोच कर मोहब्बत की.

हमारी ख़ातिर

आईना ख़ुद भी सँवरता था हमारी ख़ातिर, हम तिरे वास्ते तय्यार हुआ करते थे.

इतनी एहतियात

मुझे सँभालने में इतनी एहतियात न कर, बिखर न जाऊँ कहीं मैं तिरी हिफ़ाज़त में.

बोलने की जुरअत

तुम ने सच बोलने की जुरअत की, ये भी तौहीन है अदालत की.

तौहीन-ए-अदालत

रात को रात ही इस बार कहा है हम ने, हम ने इस बार भी तौहीन-ए-अदालत नहीं की.