20 Feb 2026
'एक मुद्दत से ख़यालों में बसा है जो शख़्स...' पढ़ें अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा के चुनिंदा शेर.
मानिंद गँवा
अहमियत का मुझे अपनी भी तो अंदाज़ा है, तुम गए वक़्त की मानिंद गँवा दो मुझ को.
ख़यालों में बसा
एक मुद्दत से ख़यालों में बसा है जो शख़्स, ग़ौर करते हैं तो उस का कोई चेहरा भी नहीं.
ख़्वाबों के दरख़्त
मैं ने ये सोच के बोए नहीं ख़्वाबों के दरख़्त, कौन जंगल में उगे पेड़ को पानी देगा.
यूँ कर दिया
मेरे हालात ने यूँ कर दिया पत्थर मुझ को, देखने वालों ने देखा भी न छू कर मुझ को.
जिस की महफ़िल
चराग़ बन के जली थी मैं जिस की महफ़िल में, उसे रुला तो गया कम से कम धुआँ मेरा.
उदासी से ऊब
मैं जब भी उस की उदासी से ऊब जाऊंगी, तो यूँ हँसेगा कि मुझ को उदास कर देगा.
कहीं बरसात
ज़िंदगी के सारे मौसम आ के रुख़्सत हो गए, मेरी आँखों में कहीं बरसात बाक़ी रह गई.
बहुत राख
कुरेदता है बहुत राख मेरे माज़ी की, मैं चूक जाऊँ तो वो उँगलियाँ जला लेगा.
मैं ज़ख़्म हूँ
ये हौसला भी किसी रोज़ कर के देखूंगी, अगर मैं ज़ख़्म हूँ उस का तो भर के देखूंगी.