26 Feb 2026

'ला हुआ कि कोई और मिल गया तुम सा...' पढ़ें ख़लील-उर-रहमान आज़मी के चुनिंदा शेर.

ज़हर सभी पीते 

यूं तो मरने के लिए ज़हर सभी पीते हैं, ज़िंदगी तेरे लिए ज़हर पिया है मैं ने.

उम्र भर तलाश

न जाने किस की हमें उम्र भर तलाश रही, जिसे क़रीब से देखा वो दूसरा निकला.

 तुम्हें भुला देते

भला हुआ कि कोई और मिल गया तुम सा, वगर्ना हम भी किसी दिन तुम्हें भुला देते.

इक ख़याल

जाने क्यूँ इक ख़याल सा आया, मैं न हूँगा तो क्या कमी होगी.

 नमाज़-ए-इश्क़

होती नहीं है यूँही अदा ये नमाज़-ए-इश्क़, याँ शर्त है कि अपने लहू से वज़ू करो.

मिरी ख़ामुशी

निकाले गए इस के मअ'नी हज़ार, अजब चीज़ थी इक मिरी ख़ामुशी.

मिरी नज़र 

मिरी नज़र में वही मोहनी सी मूरत है, ये रात हिज्र की है फिर भी ख़ूब-सूरत है.

तिरी वफ़ा

तिरी वफ़ा में मिली आरज़ू-ए-मौत मुझे, जो मौत मिल गई होती तो कोई बात भी थी.

मोहब्बत में कामयाब

सुना रहा हूं उन्हें झूट-मूट इक क़िस्सा, कि एक शख़्स मोहब्बत में कामयाब रहा.