07 March 2026
'चुप-चाप बैठे रहते हैं कुछ बोलते नहीं...' पढ़ें आदिल मंसूरी के चुनिंदा शेर.
मुझे ढूँड रहा
दरिया के किनारे पे मिरी लाश पड़ी थी, और पानी की तह में वो मुझे ढूँड रहा था.
हवाओं के हाथ
कब तक पड़े रहोगे हवाओं के हाथ में, कब तक चलेगा खोखले शब्दों का कारोबार.
चुप-चाप बैठे
चुप-चाप बैठे रहते हैं कुछ बोलते नहीं, बच्चे बिगड़ गए हैं बहुत देख-भाल से.
ज़मीन पर रात
नींद भी जागती रही पूरे हुए न ख़्वाब भी, सुब्ह हुई ज़मीन पर रात ढली मज़ार में.
अपनी आँख
सोए तो दिल में एक जहाँ जागने लगा, जागे तो अपनी आँख में जाले थे ख़्वाब के.
ख़ाक वालों
कभी ख़ाक वालों की बातें भी सुन, कभी आसमानों से नीचे उतर.
बद-ज़बान
अल्लाह जाने किस पे अकड़ता था रात दिन, कुछ भी नहीं था फिर भी बड़ा बद-ज़बान था.
ज़माने की चाल
ऐसे डरे हुए हैं ज़माने की चाल से, घर में भी पाँव रखते हैं हम तो सँभाल कर.
शब डूब रही
हम्माम के आईने में शब डूब रही थी, सिगरेट से नए दिन का धुआँ फैल रहा था.