08 March 2026
'काँप उठती हूँ मैं ये सोच के तन्हाई में...' पढ़ें परवीन शाकिर के शानदार शेर.
एहतिमाम
बहुत से लोग थे मेहमान मेरे घर लेकिन, वो जानता था कि है एहतिमाम किस के लिए.
टूट के बिखरे
जिस तरह ख़्वाब मिरे हो गए रेज़ा रेज़ा, उस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई.
सोच के तन्हाई
काँप उठती हूँ मैं ये सोच के तन्हाई में, मेरे चेहरे पे तिरा नाम न पढ़ ले कोई.
ख़सारा और
हारने में इक अना की बात थी, जीत जाने में ख़सारा और है.
साल-गिरह
यही वो दिन थे जब इक दूसरे को पाया था, हमारी साल-गिरह ठीक अब के माह में है.
शख़्स ज़माने
एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा, आँख हैरान है क्या शख़्स ज़माने से उठा.
कमाल-ए-ज़ब्त
कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी, मैं अपने हाथ से उस की दुल्हन सजाऊँगी.
वक़्त परखने
जुगनू को दिन के वक़्त परखने की ज़िद करें, बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए.
वक़्त परखने
आमद पे तेरी इत्र ओ चराग़ ओ सुबू न हों, इतना भी बूद-ओ-बाश को सादा नहीं किया.