09 March 2026

'ऐ वाए इंक़लाब ज़माने के जौर से...' बहादुर शाह ज़फ़र के वह शेर जो आज भी प्रासंगिक हैं.

फ़स्ल-ए-बहार

बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला, क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में.

हाल-ए-दिल

हाल-ए-दिल क्यूँ कर करें अपना बयाँ अच्छी तरह, रू-ब-रू उन के नहीं चलती ज़बाँ अच्छी तरह.

तिरी महफ़िल 

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी, जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी.

न दूँगा

न दूँगा दिल उसे मैं ये हमेशा कहता था, वो आज ले ही गया और 'ज़फ़र' से कुछ न हुआ.

 इश्क़ चमकाएँ 

 हम अपना इश्क़ चमकाएँ तुम अपना हुस्न चमकाओ, कि हैराँ देख कर आलम हमें भी हो तुम्हें भी हो.

दौलत-ए-दुनिया

दौलत-ए-दुनिया नहीं जाने की हरगिज़ तेरे साथ, बाद तेरे सब यहीं ऐ बे-ख़बर बट जाएगी.

ऐ वाए इंक़लाब 

ऐ वाए इंक़लाब ज़माने के जौर से, दिल्ली 'ज़फ़र' के हाथ से पल में निकल गई.

हमीं महरूम

हम ही उन को बाम पे लाए और हमीं महरूम रहे, पर्दा हमारे नाम से उट्ठा आँख लड़ाई लोगों ने.

ज़माने में नगीं 

मेहनत से है अज़्मत कि ज़माने में नगीं को, बे-काविश-ए-सीना न कभी नामवरी दी.