20 March 2026
'ऐ दिल-ए-बे-क़रार चुप हो जा...' पढ़ें साग़र सिद्दीक़ी के बेहतरीन शेर.
जब्र-ए-मुसलसल
ज़िंदगी जब्र-ए-मुसलसल की तरह काटी है, जाने किस जुर्म की पाई है सज़ा याद नहीं.
लुट जाए फ़क़ीरों
जिस अहद में लुट जाए फ़क़ीरों की कमाई, उस अहद के सुल्तान से कुछ भूल हुई है.
रौनक़-ए-बाज़ार
कल जिन्हें छू नहीं सकती थी फ़रिश्तों की नज़र, आज वो रौनक़-ए-बाज़ार नज़र आते हैं.
दिल-ए-बे-क़रार
ऐ दिल-ए-बे-क़रार चुप हो जा, जा चुकी है बहार चुप हो जा.
कोई कड़ी
मौत कहते हैं जिस को ऐ 'साग़र', ज़िंदगी की कोई कड़ी होगी.
तरफ़-दार नज़र
हश्र में कौन गवाही मिरी देगा 'साग़र', सब तुम्हारे ही तरफ़-दार नज़र आते हैं.
फ़रिश्ता नहीं हुज़ूर
मैं आदमी हूँ कोई फ़रिश्ता नहीं हुज़ूर, मैं आज अपनी ज़ात से घबरा के पी गया.
याद कीजिए
भूली हुई सदा हूँ मुझे याद कीजिए, तुम से कहीं मिला हूँ मुझे याद कीजिए.
दुआ करते
अब कहाँ ऐसी तबीअत वाले, चोट खा कर जो दुआ करते थे.