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जवाहर लाल नेहरू क्यों नहीं चाहते थे, राजेन्द्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बनें?

राजेन्द्र प्रसाद की पुण्यतिथि पर खास

by Farha Siddiqui
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जवाहर लाल नेहरू क्यों नहीं चाहते थे, राजेन्द्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बनें?

28 February 2024
ये बात उन दिनों की है, जब हमारा देश आजाद नहीं हुआ था. देश का संविधान बनाने के लिए सभा गठित कर दी गई थी. 11 दिसंबर, 1946 को डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को सर्वसम्मति से संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया. 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने अपना काम पूरा किया और भारत का संविधान बनकर तैयार हो गया। संविधान बनने के इस क्रम में संविधान सभा के लगभग हर सदस्य के मन में ये बात घर कर गई कि संविधान लागू होने के बाद भारत का पहला राष्ट्रपति तो डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को ही होना चाहिए। लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरू इससे सहमत नहीं थे।

नेहरू ने सी. राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव रख दिया. लेकिन संविधान सभा के तमाम सदस्य राजेंद्र प्रसाद के पक्ष में नेहरू के प्रस्ताव के खिलाफ खड़े हो गए. खुद कांग्रेस में ही नेहरू का व्यापक विरोध होने लगा. जब लगा कि बात ज्यादा बिगड़ जाएगी तो सरदार पटेल खुद बोले उठे, कांग्रेस में गंभीर मतभेदों को पहले भी दूर किया गया है, इस बार भी परस्पर बातचीत से कोई हल निकल आएगा। प्रधानमंत्री की विदेश से वापसी के बाद हम फिर इस पर विचार करेंगे। जल्दबाजी में फैसला करने से बेहतर है हम थोड़ी प्रतीक्षा करें.

पटेल के इस भाषण की वजह से कांग्रेसियों का हंगामा तो खत्म हो गया, लेकिन नेहरू की परेशानी बढ़ गई। सरदार पटेल ने इसे भांप लिया। नेहरू को भी लगा कि जैसा समर्थन और विश्वास सरदार पटेल को हासिल है, वैसा उनके पास नहीं है। लेकिन सरदार पटेल ने फिर एक बार संकटमोचक की भूमिका निभाई और सभी कांग्रेसियों को बता दिया कि अगर इस मसले को तूल दिया जाएगा, तो नुकसान हो सकता है, लिहाजा सभी ने चुप्पी साध ली। खुद नेहरू भी शांत हो गए,

और आखिरकार 26 जनवरी 1950 को जब देश का संविधान लागू हुआ, तो राजेन्द्र प्रसाद को देश के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ दिलाई गई. इसके बाद उन्हें दो बार और राष्ट्रपति के लिए चुना गया. ये उपलब्धि हासिल करने वाले वो भारत के इतिहास में एकमात्र राष्ट्रपति हैं।

राजेन्द्र प्रसाद का राजनैतिक सफर
3 दिसंबर, 1884 को बिहार के सिवान जिले के जीरादेई में उनका जन्म हुआ था। परिवार में सबसे छोटे होने की वजह से उन्हें बहुत प्यार मिला। उनका अपनी मां और बड़े भाई महेंद्र से गहरा लगाव था। पांच साल की उम्र से ही राजेंद्र प्रसाद ने एक मौलवी साहब से फारसी की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी। उसके बाद वो अपनी प्रारंभिक शिक्षा के लिए छपरा के जिला स्कूल गए। लेकिन स्कूलिंग पूरी भी नहीं हुई थी कि 13 साल की उम्र में राजेंद्र बाबू की शादी राजवंशी देवी से हो गयी। शादी के बाद भी उन्होंने पटना की टी० के० घोष एकेडमी से अपनी पढ़ाई जारी रखी।

गांधी जी से उनकी पहली मुलाकात

वो गांधी जी से पहली बार साल 1915 में कोलकाता में मिले, जब गांधी जी के सम्मान में एक सभा आयोजित की गई थी। दिसंबर 1916 में लखनऊ में कांग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने फिर गांधी जी को देखा। यहीं पर चंपारण के किसान नेताओं राजकुमार शुक्ला और ब्रजकिशोर प्रसाद ने गांधी जी से चंपारण आने की अपील की थी। साल 1917 राजेंद्र प्रसाद के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

राष्ट्रवादी थे राजेंद्र प्रसाद

उन्होंने राष्ट्र के मुद्दे पर लिखने के लिए पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा। उन्होंने “सर्चलाइट” और “देश” सहित क्रांतिकारी प्रकाशनों के लिए लेख लिखे। उन्होंने वास्तव में इन अखबारों के लिए पैसा जमा किया।

राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष से जेल तक का सफर

सुभाष चंद्र बोस के इस्तीफे के बाद 1937 में कांग्रेस के बॉम्बे सत्र में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में चुना गया। उनकी अध्यक्षता में, कांग्रेस ने 8 अगस्त, 1942 को भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया। इसके बाद राजेंद्र प्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया और बांकीपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया, जहां उन्होंने तीन साल बिताए। 1945 में उन्हें रिहा कर दिया गया।

राजेंद्र प्रसाद के कोट्स

“हमारे लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, हमारे तरीके अंतिम परिणाम के समान शुद्ध होने चाहिए!”

“मनुष्य के पास अब सामूहिक विनाश के हथियार होने से, मानव प्रजाति स्वयं विलुप्त होने के गंभीर खतरे में है।”

“मुझे यकीन है कि आपका व्यक्तित्व घायल आत्माओं के उपचार और अविश्वास और भ्रम के माहौल में शांति और सद्भाव की बहाली में सहायता करेगा।”

“हमें उन सभी को याद रखना चाहिए जिन्होंने आज़ादी के लिए अपनी जान दे दी।”

“अपनी उम्र के हिसाब से खेलना सीखना चाहिए।”

“हमारे लंबे और अशांत इतिहास में पहली बार, हम पूरे विशाल क्षेत्र को एक संविधान और एक संघ के अधिकार के तहत एकजुट पाते हैं, जिन पर कब्जा करने वाले 320 मिलियन से ज्यादा पुरुषों और महिलाओं की देखभाल की जिम्मेदारी है।” यह।”

हम अंग्रेजी उदाहरणों पर निर्भर रहने के इतने आदी हो गए हैं कि इसे अलग ढंग से पढ़ना लगभग अपवित्र लगता है, भले ही हमारी स्थितियाँ और परिस्थितियाँ एक अलग व्याख्या की मांग करती हैं।”

“किसी भी राष्ट्र के लिए या आगे बढ़ने वालों के लिए कोई विश्राम स्थान नहीं है।”

भारत रत्न से हुए सम्मानित

राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान और भारत के राष्ट्रपति रहने के दौरान देश की तरक्की में योगदान देने के लिए उन्हें 1962 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

पटना में हुआ निधन

1960 में राष्ट्रपति के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद अपना बचा हुआ जीवन बिहार में बिताया। लंबी बीमारी की वजह से 28 फरवरी 1963 को 79 साल की उम्र में उनका निधन हुआ

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