Home Top News परिसीमन के प्रस्तावों पर संसद से पहले चर्चा की मांग, खरगे के पत्र पर रिजिजू ने क्या कहा?

परिसीमन के प्रस्तावों पर संसद से पहले चर्चा की मांग, खरगे के पत्र पर रिजिजू ने क्या कहा?

by Sachin Kumar 19 October 2026, 9:56 PM IST
19 October 2026, 9:56 PM IST
Rijiju Mallikarjun Kharge letter PM Modi delimitation

Delimitation Debate: केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के उस पत्र का जवाब दिया, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से परिसीमन के प्रस्तावों पर चर्चा के लिए सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाने का अनुरोध किया था. रिजिजू ने कहा कि सरकार ने संबंधित विधेयक के प्रस्ताव पर विपक्ष के साथ कई बार चर्चा करने की कोशिश की है. बता दें कि 16 अक्टूबर 2026 को मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चौथा पत्र लिखकर मांग की थी कि परिसीमन के प्रस्तावों को अंतिम रूप देने और संसद में उन पर चर्चा करने से पहले सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाई जाए. वहीं, खरगे को लिखे अपने जवाबी पत्र में किरेन रिजिजू ने बताया कि उन्होंने 16 और 26 मार्च तथा 12 अप्रैल को पत्र लिखकर कांग्रेस से इस मुद्दे पर समर्थन मांगा था.

खरगे से व्यक्तिगत चर्चा की थी

किरेन रिजिजू ने बताया कि पत्र लिखने के अलावा उन्होंने मल्लिकार्जुन खरगे से व्यक्तिगत चर्चा की थी. साथ ही मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात भी की थी. हालांकि, रिजिजू ने आरोप लगाया कि कई बार अनुरोध के बाद भी कांग्रेस ने चर्चा के लिए कोई तारीख नहीं दी. इसके बाद सरकार ने अन्य राजनीतिक दलों से संपर्क करना शुरू कर दिया. उन्होंने बताया कि प्रस्तावित कानून पर बातचीत को आगे बढ़ाने और व्यापक सहमति बनाने के लिए DMK, SP, YSRCP, NCP, शिवसेना (UBT), AIMIM और BJD के प्रतिनिधियों के साथ विचार विमर्श किया गया.

विपक्षी दल रचनात्मक सहयोग दें

रिजिजू ने अपने पत्र में यह भी लिखा, अब जरूरत इस बात की है कि विपक्षी दल रचनात्मक सहयोग दें, न कि पहले हो चुकी बातचीत को नजरअंदाज को करते हुए बार-बार वही मांगें दोहराते रहें. 13 अगस्त को संसद के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद 64 दिन बीत जाने पर भी सत्र ‘सत्रावसान’ (पूरा सत्र समाप्त होना) न किए जाने को लेकर खरगे की टिप्पणी पर रिजिजू ने कहा कि संविधान में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है. उन्होंने कहा कि सत्रावसान न होने पर अपने आप में कोई संवैधानिक या अनुचित कदम नहीं माना जा सकता है.

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सत्रावसान का गरमाया मुद्दा

केंद्रीय मंत्री ने लिखा, मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि संविधान में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है, जिसमें यह तय करें कि सदन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित किए जाने के बाद उसे कितने दिनों के भीतर सत्रावसान करना होगा. इसे कोई अंसवैधानिक कार्य नहीं माना जा सकता है. रिजिजू ने बताया कि ऐसे भी मौके आए हैं जब सदन का सत्रावसान नहीं किया गया और यह स्थिति 87 दिनों तक बनी रही. उन्होंने 1987, 1989, 2006 और 2013 समेत कई उदाहरणों का जिक्र किया.

खरगे ने दी थी केंद्र सरकार को चेतावनी

रिजिजू ने फिर दोहराया कि सरकार संसदीय लोकतंत्र और सार्थक बातचीत के लिए प्रतिबद्ध है. उन्होंने उम्मीद जताई कि कांग्रेस एक सकारात्मक भूमिका निभाएगी और भविष्य में महत्वपूर्ण कानूनों को पारित होने से नहीं रोकेगी. दूसरी ओर, शुक्रवार को भेजे गए अपने पत्र में खरगे ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि 13 अगस्त को मानसून सत्र के खिलाफ अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद से 64 दिनों का एक अभूतपूर्व अंतराल आ गया है. सत्र का औपचारिक सत्रावसान भी नहीं हुआ है. उन्होंने सरकार को चेतावनी दी कि वह बिना आम सहमति के बड़े संवैधानिक संशोधनों को आगे न बढ़ाए.

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News Source: ANI

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