19 Feb 2026
'ऐसे बिगड़े कि फिर जफ़ा भी न की...' पढ़ें हसरत मोहानी के बेहतरीन शेर.
नंगे पाँव
दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए, वो तिरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है.
ख़ाना-ए-दिल
कहने को तो मैं भूल गया हूं मगर ऐ यार, है ख़ाना-ए-दिल में तिरी तस्वीर अभी तक.
हक़ अदा
ऐसे बिगड़े कि फिर जफ़ा भी न की, दुश्मनी का भी हक़ अदा न हुआ.
मोहब्बत का असर
देखने आए थे वो अपनी मोहब्बत का असर, कहने को ये है कि आए हैं अयादत कर के.
मुझ को लड़ाई
आप को आता रहा मेरे सताने का ख़याल, सुल्ह से अच्छी रही मुझ को लड़ाई आप की.
पहलू में छुपा
और तो पास मिरे हिज्र में क्या रक्खा है, इक तिरे दर्द को पहलू में छुपा रक्खा है.
इज़हार-ए-इल्तिफ़ात
वाक़िफ़ हैं ख़ूब आप के तर्ज़-ए-जफ़ा से हम, इज़हार-ए-इल्तिफ़ात की ज़हमत न कीजिए.
मथुरा में हाज़िरी
'हसरत' की भी क़ुबूल हो मथुरा में हाज़िरी, सुनते हैं आशिक़ों पे तुम्हारा करम है आज.
दामन में छुपा
बर्क़ को अब्र के दामन में छुपा देखा है, हम ने उस शोख़ को मजबूर-ए-हया देखा है.