13 Feb 2026

'मैं बचपन में खिलौने तोड़ता था...' पढ़ें जावेद अख़्तर के बेहतरीन शेर.

जीने के अंदाज़

इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं, होंटों पे लतीफ़े हैं आवाज़ में छाले हैं.

ज़िंदाबाद हिन्दोस्तान

इसी जगह इसी दिन तो हुआ था ये एलान, अंधेरे हार गए ज़िंदाबाद हिन्दोस्तान.

खिलौने तोड़ता

मैं बचपन में खिलौने तोड़ता था, मिरे अंजाम की वो इब्तिदा थी.

हालात इब्तिदा 

 यही हालात इब्तिदा से रहे, लोग हम से ख़फ़ा ख़फ़ा से रहे.

दुनिया मिलती है

अक़्ल ये कहती है दुनिया मिलती है बाज़ार में, दिल मगर ये कहता है कुछ और बेहतर देखिए.

 मुझे मायूस

मुझे मायूस भी करती नहीं है, यही आदत तिरी अच्छी नहीं है.

काजल फैल 

उस की आँखों में भी काजल फैल रहा है, मैं भी मुड़ के जाते जाते देख रहा हूँ.

फ़ुर्सत है दुख

ग़ैरों को कब फ़ुर्सत है दुख देने की, जब होता है कोई हमदम होता है.

अल्फ़ाज़ में पिरोने

अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी, हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का.