06 Jan 2026

'शराफ़तों की यहां कोई अहमियत ही नहीं...' पढ़ें वसीम बरेलवी के बेहतरीन शेर.

थके-हारे 

' थके-हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें, सलीक़ा-मंद शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है.

 तिरे बारे में

मैं जिन दिनों तिरे बारे में सोचता हूं बहुत, उन्हीं दिनों तो ये दुनिया समझ में आती है.

कुछ न बिगाड़ो 

शराफ़तों की यहां कोई अहमियत ही नहीं, किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है.

ग़म और होता

ग़म और होता सुन के गर आते न वो 'वसीम', अच्छा है मेरे हाल की उन को ख़बर नहीं.

बरसों से

जो मुझ में तुझ में चला आ रहा है बरसों से, कहीं हयात इसी फ़ासले का नाम न हो.

दिलासा न कोई

कोई इशारा दिलासा न कोई व'अदा मगर, जब आई शाम तिरा इंतिज़ार करने लगे.