03 March 2026

'हाए वो वक़्त कि जब बे-पिए मद-होशी थी...' पढ़ें असरार-उल-हक़ मजाज़ के बेहतरीन शेर.

ख़ुद मुझे 

मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो, तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है.

डूबता हूँ मैं

तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया, बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं.

बे-पिए मद-होशी

हाए वो वक़्त कि जब बे-पिए मद-होशी थी, हाए ये वक़्त कि अब पी के भी मख़्मूर नहीं.

मख़्मूर आँखों 

आप की मख़्मूर आँखों की क़सम, मेरी मय-ख़्वारी अभी तक राज़ है.

जुरअत-ए-दीदार

 या तो किसी को जुरअत-ए-दीदार ही न हो, या फिर मिरी निगाह से देखा करे कोई.

आवाज़ ही आवाज़

छुप गए वो साज़-ए-हस्ती छेड़ कर, अब तो बस आवाज़ ही आवाज़ है.

रंग-ए-एहतराम 

फिर किसी के सामने चश्म-ए-तमन्ना झुक गई, शौक़ की शोख़ी में रंग-ए-एहतराम आ ही गया.

ना-ख़ुदा क्या

डुबो दी थी जहां तूफ़ां ने कश्ती, वहाँ सब थे ख़ुदा क्या ना-ख़ुदा क्या.

 कमाल-ए-इश्क़ 

 कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूं मैं, ये किस के हाथ से दामन छुड़ा रहा हूँ मैं.