18 April 2026
भारत की शादियों की जान बनी मुगलों की ये विरासत, शादियों में छाई Farshi Salwar.
कमबैक हो रहा
आजकल फैशन की दुनिया में पुराने दौर का कमबैक हो रहा है और इन्हीं में से एक है फर्शी सलवार का ट्रेंड. ट्रेंड्स की बात करने से पहले इस शब्द के मतलब को भी समझ लेते हैं.
आउटफिट
‘फर्शी’ शब्द फारसी के ‘फर्श’ से निकला है, जिसका मतलब होता है ज़मीन, और यकीन मानिए, ये आउटफिट बिल्कुल अपने नाम जैसा ही है.
रॉयल्टी देता है
जमीन को छूता है, पीछे एक शानदार टेल की तरह चलता है और पहनने वाले को एक अलग ही रॉयल्टी देता है. फर्शी सलवार रीयल में एक चौड़ी मोहरी वाला, फर्श को टच करने वाला लंबा ट्राउजर है जिसमें एक बड़ा घेरा होता है.
मुगल दरबारों
फर्शी सलवार की जड़ें 17वीं और 18वीं शताब्दी के मुगल दरबारों से जुड़ी हैं. खास तौर से उत्तर प्रदेश के लखनऊ और हैदराबाद जैसी जगहों पर इसे खूब पसंद किया गया.
वेडिंग वार्डरोब
यहां का टेक्सटाइल ट्रेडिशन आज भी साउथ एशिया और गल्फ कंट्रीज के वेडिंग वार्डरोब को इफैक्ट कर रहा है. उस दौर में ये सिर्फ एक आउटफिट नहीं, बल्कि रईसी और ऊंचे खानदान की पहचान थी.
सोने के धागों
रेशम, ब्रोकेड, जामवार और मखमल से बने इस लिबास में कभी-कभी 6 से 10 मीटर तक कपड़ा लगता था, जिसे जरदोजी, गोटा-पत्ती और असली सोने के धागों की बारीक कढ़ाई से सजाया जाता था.
ब्रिटिश महिलाओं
कई इतिहासकारों का ये भी मानना है कि फर्शी सलवार की ये लंबाई शायद ब्रिटिश महिलाओं के लंबे गाउन से इंस्पायर थी.
लखनऊ की बेगमों
अवध और लखनऊ की बेगमों ने शायद उस स्टाइल को अपनाकर भारतीय कारीगरी के सांचे में ढाल दिया और एक ऐसी चीज तैयार की जो पूरी तरह अलग और शानदार थी.
शतरंज के खिलाड़ी
‘उमराव जान’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसी क्लासिक फिल्मों ने फर्शी सलवार को पर्दे पर अमर कर दिया. 19वीं सदी के लखनऊ की नजाकत और नवाबी शान को दिखाने के लिए इस लिबास का खूबसूरती से इस्तेमाल किया गया.