25 Jan 2026

'अब तो उन की याद भी आती नहीं...' पढ़ें फ़िराक़ गोरखपुरी के सदाबहार शेर.

शराब तो संजीदा

आए थे हंसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़', जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए.

तिरा इंतिज़ार

न कोई वा'दा न कोई यक़ीं न कोई उमीद, मगर हमें तो तिरा इंतिज़ार करना था.

काट दिए ज़िंदगी

ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त, वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में.

तन्हा हो गईं

अब तो उन की याद भी आती नहीं, कितनी तन्हा हो गईं तन्हाइयां.

चार दिन

ये माना ज़िंदगी है चार दिन की, बहुत होते हैं यारो चार दिन भी.

 इश्क़ नाम

सुनते हैं इश्क़ नाम के गुज़रे हैं इक बुज़ुर्ग, हम लोग भी फ़क़ीर उसी सिलसिले के हैं.

क्या चीज़ है 

रात भी नींद भी कहानी भी, हाए क्या चीज़ है जवानी भी.

धोके पे दिया

कम से कम मौत से ऐसी मुझे उम्मीद नहीं, ज़िंदगी तू ने तो धोके पे दिया है धोका.

तेरे हिज्र में

बहुत दिनों में मोहब्बत को ये हुआ मा'लूम, जो तेरे हिज्र में गुज़री वो रात रात हुई.