11 Jan 2026
'तुम सलामत रहो हज़ार बरस...' गालिब के वह शेर जिन्होंने खूब महफिल लूटी.
फ़क़ीरों का
बना कर फ़क़ीरों का हम भेस 'ग़ालिब', तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं.
मुसाहिब फिरे
हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता, वगरना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है.
इशरत-ए-क़तरा
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना.
ज़ीस्त का मज़ा
इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया, दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया.
सलामत रहो
तुम सलामत रहो हज़ार बरस, हर बरस के हों दिन पचास हज़ार.
हाल-ए-दिल पे
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हंसी, अब किसी बात पर नहीं आती.
तिरी ज़ुल्फ़
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक, कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक.
इक बरहमन
देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़, इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है.
मुँह में ज़बान
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूं, काश पूछो कि मुद्दआ क्या है.