15 Feb 2026
'हम नहीं थे तो क्या कमी थी यहां...' पढ़ें मुनव्वर राना के लाजवाब शेर.
बिखरी हुई यादों
कुछ बिखरी हुई यादों के क़िस्से भी बहुत थे, कुछ उस ने भी बालों को खुला छोड़ दिया था.
लौटूँ मेरी माँ
ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता, मैं जब तक घर न लौटूँ मेरी माँ सज्दे में रहती है.
क्या कमी होगी
हम नहीं थे तो क्या कमी थी यहां, हम न होंगे तो क्या कमी होगी.
बच्चे रेल
फ़रिश्ते आ कर उन के जिस्म पर ख़ुश्बू लगाते हैं, वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं.
मोहब्बत में इंतिज़ार
तमाम जिस्म को आंखें बना के राह तको, तमाम खेल मोहब्बत में इंतिज़ार का है.
गाँव में छप्पर
तुम्हारे शहर में मय्यत को सब कांधा नहीं देते, हमारे गाँव में छप्पर भी सब मिल कर उठाते हैं.
मशक़्क़त से बदन
दिन भर की मशक़्क़त से बदन चूर है लेकिन, मां ने मुझे देखा तो थकन भूल गई है.
गांव की पगडंडियां
शहर के रस्ते हों चाहे गांव की पगडंडियां, माँ की उँगली थाम कर चलना बहुत अच्छा लगा.
किताबें क़लम
बच्चों की फ़ीस उन की किताबें क़लम दवात, मेरी गरीब आँखों में स्कूल चुभ गया.