13 Jan 2026

'कुछ वक़्त चाहते थे कि सोचें तिरे लिए...' पढ़ें मुनीर नियाज़ी के वह शेर जिन्होंने बनाई लोगों के दिलों में जगह.

इसी रस्म के

मैं उस को देख के चुप था उसी की शादी में, मज़ा तो सारा इसी रस्म के निबाह में था.

मकाँ है क़ब्र

मकाँ है क़ब्र जिसे लोग ख़ुद बनाते हैं, मैं अपने घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ.

हल्का गुलाबी

नींद का हल्का गुलाबी सा ख़ुमार आँखों में था, यूँ लगा जैसे वो शब को देर तक सोया नहीं.

सोचें तिरे लिए

कुछ वक़्त चाहते थे कि सोचें तिरे लिए, तू ने वो वक़्त हम को ज़माने नहीं दिया.

इक हश्र 

मिलती नहीं पनाह हमें जिस ज़मीन पर, इक हश्र उस ज़मीं पे उठा देना चाहिए.

ख़ूबसूरत ज़िंदगी

'मुनीर' इस ख़ूबसूरत ज़िंदगी को, हमेशा एक सा होना नहीं है.

सफ़र की राइगानी

था 'मुनीर' आग़ाज़ ही से रास्ता अपना ग़लत, इस का अंदाज़ा सफ़र की राइगानी से हुआ.

गहरे मलाल

है 'मुनीर' तेरी निगाह में, कोई बात गहरे मलाल की.

शोख़ पहले 

ग़ैरों से मिल के ही सही बे-बाक तो हुआ, बारे वो शोख़ पहले से चालाक तो हुआ.