21 Feb 2026

'इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना...' पढ़ें मिर्ज़ा ग़ालिब के लोकप्रिय शेर.

मिरी बात

या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात, दे और दिल उन को जो न दे मुझ को ज़बां और.

फ़क़ीरों

बना कर फ़क़ीरों का हम भेस 'ग़ालिब', तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं.

डुबोया मुझ को

 न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता, डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता.

मुसाहिब फिरे है

हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता, वगरना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है.

तीर-ए-नीम-कश

 कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को, ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता.

दरिया में फ़ना

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना.

ज़ीस्त का मज़ा

इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया, दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया.

हज़ार बरस

तुम सलामत रहो हज़ार बरस, हर बरस के हों दिन पचास हज़ार.

हाल-ए-दिल

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हंसी, अब किसी बात पर नहीं आती.