27 Feb 2026
'मिरे राहबर मुझ को गुमराह कर दे...' पढ़ें ख़ुमार बाराबंकवी के सदाबहार शेर.
ख़ुदा याद
हैरत है तुम को देख के मस्जिद में ऐ 'ख़ुमार', क्या बात हो गई जो ख़ुदा याद आ गया.
तब्सिरा कीजिए
दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिए, सामने आइना रख लिया कीजिए.
इंतिज़ार मुझे
अब इन हुदूद में लाया है इंतिज़ार मुझे, वो आ भी जाएँ तो आए न ए'तिबार मुझे.
जहल दोस्तो
हद से बढ़े जो इल्म तो है जहल दोस्तो, सब कुछ जो जानते हैं वो कुछ जानते नहीं.
जज़्बात
ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं रही, जज़्बात में वो पहली सी शिद्दत नहीं रही.
ख़ुशी है न
ग़म है न अब ख़ुशी है न उम्मीद है न यास, सब से नजात पाए ज़माने गुज़र गए.
मंज़िल क़रीब
मिरे राहबर मुझ को गुमराह कर दे, सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है.
तुझे बर्बाद किया
तुझ को बर्बाद तो होना था बहर-हाल 'ख़ुमार', नाज़ कर नाज़ कि उस ने तुझे बर्बाद किया.
चराग़ों के बदले
चराग़ों के बदले मकाँ जल रहे हैं, नया है ज़माना नई रौशनी है.