13 Jan 2026

'कुछ बता तू ही नशेमन का पता... ' मजरूह सुल्तानपुरी के चुनिंदा शेर.

तूफ़ाँ की मौज

बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की मौज ने वर्ना, किनारे वाले सफ़ीना मिरा डुबो देते.

सरों के चराग़

सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़, जहां तलक ये सितम की सियाह रात चले.

तिरे आस्ताँ

अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम, उठने को उठ तो आए तिरे आस्ताँ से हम.

ज़बाँ हमारी

ज़बाँ हमारी न समझा यहाँ कोई 'मजरूह', हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे.

तिरी महफ़िल 

तिरे सिवा भी कहीं थी पनाह भूल गए, निकल के हम तिरी महफ़िल से राह भूल गए.

आवाज़ हैं दीवार

रोक सकता हमें ज़िंदान-ए-बला क्या 'मजरूह', हम तो आवाज़ हैं दीवार से छन जाते हैं.

इक बार सज्दा 

हम हैं का'बा हम हैं बुत-ख़ाना हमीं हैं काएनात, हो सके तो ख़ुद को भी इक बार सज्दा कीजिए.

मिरे दास्ताँ

ह'मजरूह' क़ाफ़िले की मिरे दास्ताँ ये है, रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ.

नशेमन का पता

कुछ बता तू ही नशेमन का पता, मैं तो ऐ बाद-ए-सबा भूल गया.