12 Feb 2026

'तअल्लुक़ात में गहराइयाँ तो अच्छी हैं...' पढ़ें ऐतबार साजिद के चुनिंदा शेर.

इन दूरियों 

इन दूरियों ने और बढ़ा दी हैं क़ुर्बतें, सब फ़ासले वबा की तवालत से मिट गए.

तअल्लुक़ात में गहराइयाँ 

तअल्लुक़ात में गहराइयाँ तो अच्छी हैं, किसी से इतनी मगर क़ुर्बतें भी ठीक नहीं.

रेल के सफ़र

अभी रेल के सफ़र में हैं बहुत निहाल दोनों, कहीं रोग बन न जाए यही साथ दो घड़ी का.

 ग़म-ए-फ़ुर्क़त

पहले ग़म-ए-फ़ुर्क़त के ये तेवर तो नहीं थे, रग रग में उतरती हुई तन्हाई तो अब है.

बर-सर-ए-बाज़ा

भीड़ है बर-सर-ए-बाज़ार कहीं और चलें, आ मिरे दिल मिरे ग़म-ख़्वार कहीं और चलें.

इख़्तिताम-ए-बाब 

रस्ते का इंतिख़ाब ज़रूरी सा हो गया, अब इख़्तिताम-ए-बाब ज़रूरी सा हो गया.

दिल-आज़ार

ये जो फूलों से भरा शहर हुआ करता था, उस के मंज़र हैं दिल-आज़ार कहीं और चलें.

रंग-ए-सियासत

तुम्हारे साथ त'अल्लुक़ तो दोस्ताना था, तुम इस में रंग-ए-सियासत कहाँ से ले आए.

ख़ास रंग

ग़ज़ल फ़ज़ा भी ढूँडती है अपने ख़ास रंग की, हमारा मसअला फ़क़त क़लम दवात ही नहीं.