01 March 2026

'हुए नामवर बे-निशां कैसे कैसे...' पढ़ें अमीर मीनाई के चुनिंदा शेर.

ग़ुस्से पे प्यार

तुम को आता है प्यार पर ग़ुस्सा, मुझ को ग़ुस्से पे प्यार आता है.

नाख़ुदा जिन

कश्तियां सब की किनारे पे पहुंच जाती हैं, नाख़ुदा जिन का नहीं उन का ख़ुदा होता है.

नामवर बे-निशां

हुए नामवर बे-निशां कैसे कैसे, ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे.

गाहे की मुलाक़ात

 गाहे गाहे की मुलाक़ात ही अच्छी है 'अमीर', क़द्र खो देता है हर रोज़ का आना जाना.

दर्द हमारे

ख़ंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम 'अमीर', सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है.

शौक़-ए-दीदार 

कौन सी जा है जहाँ जल्वा-ए-माशूक़ नहीं, शौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर.

 इतना मुख़्तसर

वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर, दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए.

बात में लज़्ज़त

उल्फ़त में बराबर है वफ़ा हो कि जफ़ा हो, हर बात में लज़्ज़त है अगर दिल में मज़ा हो.

 नाज़ भी अंदाज़

आफ़त तो है वो नाज़ भी अंदाज़ भी लेकिन, मरता हूँ मैं जिस पर वो अदा और ही कुछ है.