23 Feb 2026
'कोई कमरे में आग तापता हो...' पढ़ें तहज़ीब हाफ़ी के बेहतरीन शेर.
रौशनी में ठंडक
इस लिए रौशनी में ठंडक है, कुछ चराग़ों को नम किया गया है.
मुँह खुला
नींद ऐसी कि रात कम पड़ जाए, ख़्वाब ऐसा कि मुँह खुला रह जाए.
मेरी नक़लें
मेरी नक़लें उतारने लगा है, आईने का बताओ क्या किया जाए.
ज़मीं की वुसअत
आसमाँ और ज़मीं की वुसअत देख, मैं इधर भी हूँ और उधर भी हूँ.
आग तापता
कोई कमरे में आग तापता हो, कोई बारिश में भीगता रह जाए.
मज़ार बने
क्या मुझ से भी अज़ीज़ है तुम को दिए की लौ, फिर तो मेरा मज़ार बने और दिया जले.
दरिया देखना
मिरे हाथों से लग कर फूल मिट्टी हो रहे हैं, मिरी आँखों से दरिया देखना सहरा लगेगा.
छोड़ के घर
मैं जंगलों की तरफ़ चल पड़ा हूँ छोड़ के घर, ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है.
कई दिन गुज़ार
मैं जिस के साथ कई दिन गुज़ार आया हूं, वो मेरे साथ बसर रात क्यूँ नहीं करता.