10 Jan 2026
'ये आरज़ू भी बड़ी चीज़ है मगर हमदम...' फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के वह शेर जिन्होंने सत्ता को चुनौती दी.
शब-गज़ीदा
1. ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर, वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं.
फ़ुर्सत-ए-गुनाह
इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन, देखे हैं हम ने हौसले परवरदिगार के.
तेरी रहगुज़र
न जाने किस लिए उम्मीद-वार बैठा हूँ, इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुज़र भी नहीं.
गुज़रती है रक़म
हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे, जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे.
मसरूफ़-ए-इंतिज़ार
जानता है कि वो न आएंगे, फिर भी मसरूफ़-ए-इंतिज़ार है दिल.
आरज़ू की बात
ये आरज़ू भी बड़ी चीज़ है मगर हमदम, विसाल-ए-यार फ़क़त आरज़ू की बात नहीं.
शिफ़ा क्यूँ नहीं
बे-दम हुए बीमार दवा क्यूं नहीं देते, तुम अच्छे मसीहा हो शिफ़ा क्यूँ नहीं देते.
अजीब रंग
न गुल खिले हैं न उन से मिले न मय पी है, अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है.
शराब आए
आए कुछ अब्र कुछ शराब आए, इस के ब'अद आए जो अज़ाब आए.