03 March 2026

'तुझ से किस तरह मैं इज़हार-ए-तमन्ना करता...' पढ़ें अहमद नदीम क़ासमी के शानदार शेर.

 उतर जाऊँगा

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊंगा, मैं तो दरिया हूं समुंदर में उतर जाऊँगा.

शहकार हो तुम

जिस भी फ़नकार का शहकार हो तुम, उस ने सदियों तुम्हें सोचा होगा.

मिरी क़िस्मत

मैं ने समझा था कि लौट आते हैं जाने वाले, तू ने जा कर तो जुदाई मिरी क़िस्मत कर दी.

लफ़्ज़ सूझा

तुझ से किस तरह मैं इज़हार-ए-तमन्ना करता, लफ़्ज़ सूझा तो मआ'नी ने बग़ावत कर दी.

आसमाँ से हम

आख़िर दुआ करें भी तो किस मुद्दआ के साथ, कैसे ज़मीं की बात कहें आसमाँ से हम.

मुसाफ़िर ही मुसाफ़िर

मुसाफ़िर ही मुसाफ़िर हर तरफ़ हैं, मगर हर शख़्स तन्हा जा रहा है.

मानिंद जलाता

ज़िंदगी शम्अ की मानिंद जलाता हूं 'नदीम', बुझ तो जाऊंगा मगर सुबह तो कर जाऊँगा.

तिरी उम्र

ख़ुदा करे कि तिरी उम्र में गिने जाएं, वो दिन जो हम ने तिरे हिज्र में गुज़ारे थे.

मोहब्बत मिरी

मुझ को दुश्मन के इरादों पे भी प्यार आता है, तिरी उल्फ़त ने मोहब्बत मिरी आदत कर दी.