12 Feb 2026

'मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो...' पढ़ें असरार-उल-हक़ मजाज़ के शानदार शेर.

इंसाँ की जुस्तुजू

हिन्दू चला गया न मुसलमां चला गया, इंसाँ की जुस्तुजू में इक इंसाँ चला गया.

मिरी आँख 

फिर मिरी आँख हो गई नमनाक, फिर किसी ने मिज़ाज पूछा है.

मिरी बर्बादियों

मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो, तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है.

 डूबता हूँ

तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया, बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं.

मख़्मूर आँखों

आप की मख़्मूर आँखों की क़सम, मेरी मय-ख़्वारी अभी तक राज़ है.

जुरअत-ए-दीदार 

 या तो किसी को जुरअत-ए-दीदार ही न हो, या फिर मिरी निगाह से देखा करे कोई.

साज़-ए-हस्ती

छुप गए वो साज़-ए-हस्ती छेड़ कर, अब तो बस आवाज़ ही आवाज़ है.

तूफ़ाँ ने कश्ती

डुबो दी थी जहाँ तूफ़ाँ ने कश्ती, वहाँ सब थे ख़ुदा क्या ना-ख़ुदा क्या.

कमाल-ए-इश्क़ 

कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं, ये किस के हाथ से दामन छुड़ा रहा हूँ मैं.