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परंपरा और विकास का मेल: गुजरात बजट के कवर पर छाईं ‘कंसरी देवी’, वारली पेंटिंग से सजी बुकलेट

by Live Times
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परंपरा और विकास का मेल: गुजरात बजट 2026-27 के कवर पर छाईं 'कंसरी देवी', वारली पेंटिंग से सजी बुकलेट

Gujarat Budget: गुजरात विधानसभा का बजट सत्र बुधवार से शुरू हो रहा है. वित्त मंत्री कनुभाई देसाई 18 फरवरी को वर्ष 2026-27 का राज्य बजट पेश करेंगे.

  • अहमदाबाद से निकुल पटेल

Gujarat Budget: गुजरात विधानसभा का बजट सत्र बुधवार से शुरू हो रहा है. वित्त मंत्री कनुभाई देसाई 18 फरवरी को वर्ष 2026-27 का राज्य बजट पेश करेंगे. इस वर्ष की बजट बुकलेट के लिए 1200 साल पुरानी ‘वारली पेंटिंग’ को चुना गया है, जिसमें आदिवासी देवी ‘कंसरी देवी’ की तस्वीर अंकित है. आदिवासी संस्कृति में कंसरी देवी को खुशहाली, सुख और समृद्धि की देवी माना जाता है. गुजरात सरकार पिछले चार वर्षों से बजट बुकलेट पर वारली पेंटिंग को स्थान देने की परंपरा का निर्वहन कर रही है. वित्त मंत्री कनुभाई देसाई द्वारा चुनी गई यह आकर्षक बुकलेट न केवल राज्य की समृद्ध लोक कला को प्रदर्शित करती है, बल्कि विकास के साथ सांस्कृतिक विरासत के जुड़ाव का भी प्रतीक है. राज्य की प्रगति में ‘अन्नपूर्णा’ स्वरूप मानी जाने वाली देवी का यह चित्रण विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. कंसरी देवी आदिवासियों की देवी हैं. जब भी किसी के घर में शादी होती है, खेत में नया अनाज निकलता है या कोई भी शुभ अवसर होता है तो कंसरी देवी को स्थापित करके उनकी पूजा की जाती है.

आदिवासियों की आधार देवी भी हैं कंसरी देवी

कंसरी देवी को मां अन्नपूर्णा भी कहा जाता है. उनकी स्थापना और पूजा से धन-दौलत के भंडार भरे रहते हैं और हर तरह की खुशियां मिलती हैं, इस तरह कंसरी देवी को खुशहाली की देवी माना जाता है. उनकी कृपा से सुख-समृद्धि मिलती है. कंसारी देवी को आदिवासियों के लिए आधार देवी भी माना जाता है. वारली जनजाति के लोग दक्षिण गुजरात के वलसाड और पड़ोसी महाराष्ट्र के ठाणे जिले में रहते हैं. वे अपनी अनोखी पेंटिंग कला के लिए जाने जाते हैं. खासकर वारली औरतें त्योहारों, सगाई, शादी, फसल कटाई, जन्म जैसे कई मौकों पर घर के सामने दीवार पर पत्थर पर भीगे हुए चावल को गूंथकर बनाए गए सफेद रंग से घर की दीवारों को रंगती हैं. पेंटिंग्स में रोज़मर्रा की ज़िंदगी के त्योहार, डांस, जंगल, पहाड़, नदियां, झरने, देवी-देवता वगैरह दिखाए गए हैं. पेंटिंग्स में नाचते हुए लोग, कुएं से पानी भरती औरतें, चरवाहे, चरते हुए जानवर, ताड़ के पेड़ों से ताड़ी निकालते लोग, अलग-अलग पेड़, पक्षी, सांप, अजगर, झोपड़ियां, खेतों में किए जाने वाले काम जैसे बाजरा पीसना, फटकना, चावल कूटने के दृश्य दिखते हैं.

1200 साल पुरानी है वारली पेंटिंग

पेंटिंग्स में छलनी से अनाज साफ करना, लड़कों को झुलाना, कूड़ा इकट्ठा करना, खाना बनाना, खेत जोतती औरतें, निराई करना, बुवाई करना, लकड़ी का बोझ उठाना, इंद्रदेव को सलाम करना, वाघदेव की पूजा करना, बैलगाड़ी ले जाना व शिकार करने की भी तस्वीरें दिखती हैं. जंगली जानवर, पक्षी, कीड़े, नागदेव, पंचोरादेव, इंद्रदेव, वाघदेव और कंसारी देवी पेंटिंग्स के मुख्य सब्जेक्ट हैं. इसके अलावा भीगे हुए चावल से बने सफेद पेंट , पेंटिंग मैटीरियल के तौर पर सिंदूर, गुलाब, शहद, काली राख का भी इस्तेमाल किया जाता है. आम तौर पर, ये पेंटिंग्स ट्रायंगल, सर्किल और स्क्वेयर जैसे ज्योमीट्रिक आकार और लाइनों की मदद से बनाई जाती हैं. वारली पेंटिंग 1200 साल पुरानी है. मॉडर्न दुनिया ने वारली जाति की ज़िंदगी में भी बदलाव लाए हैं और यह कला दूसरी पुरानी कलाओं की तरह समय के गर्भ में गायब होती जा रही है. ऐसे समय में गुजरात सरकार की तरफ से इस पेंटिंग को बजट बुक पर रखकर वारली पेंटिंग को ज़िंदा रखने की एक अच्छी कोशिश की जा रही है. गौरतलब है कि इस साल भी बीना हसमुख पटेल ने बजट बुक पर वारली पेंटिंग बनाई है. वह पिछले चार सालों से बजट बुक पर तस्वीरें बनाकर यह सर्विस दे रहे हैं.

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