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हॉस्पिटल से कोर्ट तक का संघर्ष: पैर कटने के बाद डिलीवरी मैन को मिला करोड़ों का हर्जाना

by Sanjay Kumar Srivastava
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हॉस्पिटल से कोर्ट तक का संघर्ष: एक महीने के इलाज और पैर कटने के बाद डिलीवरी मैन को मिला करोड़ों का हर्जाना

Delhi Tribunal: दिल्ली मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) ने 21 वर्षीय एक युवक को 1.36 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया है.

Delhi Tribunal: दिल्ली मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) ने 21 वर्षीय एक युवक को 1.36 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया है. उसका 2024 में एक सड़क दुर्घटना में पैर कट गया था.पीड़ित एहतशाम द्वारा दायर दावा याचिका पर पीठासीन अधिकारी पूजा अग्रवाल सुनवाई कर रही थीं. युवक दुर्घटना के समय डिलीवरी मैन के रूप में काम कर रहा था. 14 सितंबर, 2024 को एहतशाम दिल्ली के मजनू का टीला के पास अपनी मोटरसाइकिल से जा रहा था, तभी ट्रक ने उसकी मोटरसाइकिल को पीछे से टक्कर मार दी. वह अपनी बाइक सहित गिर गया. ट्रक उसे तीन से चार फीट तक घसीटता हुआ ले गया, जिसके परिणामस्वरूप उसे गंभीर चोटें आईं.

युवक को 3-4 फीट तक घसीटता रहा ट्रक

उसे पहले ट्रॉमा सेंटर सिविल लाइंस ले जाया गया और फिर इलाज के लिए लोक नायक अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया. उसे एक महीने के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया, ऑपरेशन किया गया और उसका बायां पैर काट दिया गया. न्यायाधिकरण ने 23 मार्च को अपने फैसले में कहा कि वाहन ने युवक को टक्कर मार दी और 3-4 फीट तक घसीटता रहा, जो ट्रक चालक की लापरवाही दिखाती है. ट्रिब्यूनल ने कहा कि याचिकाकर्ता की गवाही स्पष्ट थी, क्योंकि यह दुर्घटना के तुरंत बाद सिविल लाइंस पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 281 (तेज या लापरवाही से ड्राइविंग) और 125 (ए) (मानव जीवन को खतरे में डालते हुए लापरवाही से काम करना) के तहत एफआईआर दर्ज करने के लिए दिए गए उसके बयान के अनुरूप थी. तथ्य के साथ-साथ दुर्घटना के तरीके के संबंध में उनकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता है.

अदालत ने भविष्य की चुनौतियों को माना आधार

ट्रिब्यूनल ने कहा कि याचिकाकर्ता को लगी चोटें गंभीर थीं. उसका ऑपरेशन करना पड़ा और परिणामस्वरूप उसका बायां पैर काटना पड़ा. उसे 80 प्रतिशत कार्यात्मक रूप से अक्षम माना गया था. ट्रिब्यूनल ने उसे विभिन्न मदों के तहत मुआवजे के रूप में 1.36 करोड़ रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया, जिसमें भविष्य के चिकित्सा खर्च भी शामिल थे, जो 77.95 लाख रुपये तक आए. याचिकाकर्ता ने साबित किया कि कृत्रिम अंग को बदलने के लिए एक बार 11.13 लाख रुपये की लागत आती है और हर छह से सात साल में नियमित प्रतिस्थापन की आवश्यकता होगी. यह देखते हुए कि वह 20 वर्ष का था, अदालत ने इसे उचित ठहराया. ट्रिब्यूनल ने कहा कि याचिकाकर्ता को स्थायी शारीरिक विकलांगता वाले व्यक्ति के रूप में लंबा जीवन जीना होगा और उसे स्पष्ट रूप से अपने पूरे जीवन के लिए एक कृत्रिम अंग की आवश्यकता होगी.

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News Source: PTI

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