MP News: मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने प्रदेश के दो लाख से अधिक शिक्षकों के भविष्य को लेकर चिंता जाहिर की है.
MP News: मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने प्रदेश के दो लाख से अधिक शिक्षकों के भविष्य को लेकर चिंता जाहिर की है. उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों पर थोपी जा रही टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता को रद्द करने या इसमें ढील देने के लिए राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय में मजबूती से पक्ष रखे. शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) 2009 के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों के लिए टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया है. इसके पालन में मध्य प्रदेश शिक्षा विभाग ने मार्च 2026 में आदेश जारी कर सभी शिक्षकों के लिए यह परीक्षा अनिवार्य कर दी है, जो संभवत: जुलाई-अगस्त 2026 में आयोजित होगी. इस आदेश से उन शिक्षकों में हडक़ंप है जो पिछले 25-30 वर्षों से सेवाएं दे रहे हैं.
पत्र की मुख्य बातें
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने पत्र में तर्क दिया है कि 40 से 50 वर्ष की आयु पार कर चुके शिक्षकों से सेवा के अंतिम पड़ाव में परीक्षा लेना न्यायसंगत नहीं है.कहा कि टीईटी की अनिवार्यता को कानून लागू होने के पहले से नियुक्त शिक्षकों पर थोपना गलत है. इसे भविष्य की नियुक्तियों के लिए लागू किया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय मूलत: महाराष्ट्र राज्य से संबंधित था. मध्य प्रदेश इस मामले में पक्षकार नहीं था, फिर भी इसे यहां लागू कर दिया गया. मध्य प्रदेश में पिछले 25 वर्षों से व्यापमं के माध्यम से कड़ी मेरिट प्रक्रिया और टीईटी जैसी परीक्षाओं के आधार पर ही वर्ग.1, 2 और 3 की नियुक्तियां हुई हैं. ऐसे में अनुभवी शिक्षकों को दोबारा परीक्षा देना अनुचित है. कहा कि परीक्षा में असफल होने पर शिक्षकों की सेवा समाप्ति या जबरन सेवानिवृत्ति का खतरा है, जिससे हजारों परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाएगा.
सरकार से की ये मांगें
दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री को सुझाव दिया है कि सरकार स्वयं सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन या क्यूरेटिव पिटिशन दायर करे. उन्होंने मांग की है कि शिक्षकों को उनके पुराने अनुभव और मेरिट के आधार पर इस परीक्षा से छूट दी जाए. जब तक न्यायालय का अंतिम फैसला न आए, तब तक प्रस्तावित टीईटी परीक्षा को स्थगित रखा जाए. सरकार स्वयं शिक्षकों का पक्ष रखे ताकि गरीब शिक्षकों पर कानूनी लड़ाई का आर्थिक बोझ न पड़े.
गुणवत्ता का दिया हवाला
पत्र में उल्लेख किया गया है कि इन्हीं शिक्षकों के मार्गदर्शन में प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था सुधरी है, जिसका प्रमाण हाल ही में यूपीएससी में चयनित प्रदेश के 62 छात्र हैं. ऐसे अनुभवी शिक्षकों की योग्यता पर सवाल उठाना उनके मनोबल को गिराने जैसा है.
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