Home Latest News & Updates विकास की बलि चढ़ता अन्नदाता, केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में जलती चिताओं पर लेटे किसान

विकास की बलि चढ़ता अन्नदाता, केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में जलती चिताओं पर लेटे किसान

by Nitin Thakur
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Farmers pyres protest Ken-Betwa Link Project Bundelkhand

Bhopal News: मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में इन दिनों किसानों ने सरकार की परियोजना का विरोध करने के लिए अनोखा तरीका तलाशा है. उन्होंने नदी के बीचों-बीच फांसी का फंदा लगाकर खड़े हो गए.

Bhopal News: बुंदेलखंड की तपती धरती पर इन दिनों विकास और विनाश के बीच एक भयावह संघर्ष छिड़ा हुआ है. देश की पहली नदी जोड़ों परियोजना केन-बेतवा लिंक अब विवादों के घेरे में है. छतरपुर और पन्ना जिले के 14 गांवों के हजारों किसान पिछले 12 दिनों से नदी के तट पर डेरा डाले हुए हैं. अपनी पुश्तैनी जमीन और आशियाने के बदले उचित मुआवजे की मांग को लेकर किसानों का धैर्य अब जवाब दे चुका है, जिसका नतीजा एक बेहद खौफनाक विरोध प्रदर्शन के रूप में सामने आया है.

बीते दिन आंदोलन ने उस वक्त उग्र रूप ले लिया जब किसान नदी के बीचों-बीच गले में फांसी का फंदा डालकर खड़े हो गए. दृश्य इतना वचलित करने वाला था कि देखने वालों की रूह कांप गई. इतना ही नहीं, तपती दोपहर में जब पारा 45 डिग्री के पार था, तब महिला किसान अपनी चिताएं सजाकर उन पर लेट गईं. हाथों में तख्तियां लिए बुजुर्ग और बच्चे भी इस करो या मरो की लड़ाई में शामिल हैं. किसानों का कहना है कि प्रशासन उनकी जमीनें तो ले रहा है, लेकिन बदले में मिलने वाला मुआवजा उनकी जिंदगी दोबारा शुरू करने के लिए नाकाफी है.

प्रशासन के साथ बेनतीजा रही दो घंटे की बैठक

किसानों के इस रौद्र रूप को देख जिला प्रशासन में हडकंप मच गया. आनन-फानन में वरिष्ठ अधिकारियों की एक टीम मौके पर पहुंची और किसान प्रतिनिधियों के साथ करीब 2 घंटे तक बंद कमरे में बैठक की. प्रशासन ने किसानों के सामने पांच मुख्य बिंदुओं पर सहमति जताई. किसानों की मांग है कि जमीनों का दोबारा सर्वे कराया जाएगा. परिवार की महिलाओं को अलग से मुआवजे का प्रावधान होगा. विस्थापितों के लिए गांव के बदले गांव बसाने की नीति अपनाई जाएगी. मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 25 लाख रुपए प्रति एकड़ करने पर विचार होगा. विस्थापन की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रखी जाएगी.

आश्वासन नहीं, धरातल पर चाहिए कार्रवाई

हालांकि, प्रशासन के इन वादों का प्रदर्शनकारियों पर कोई खास असर नहीं पड़ा. किसान नेता अमित भटनागर ने स्पष्ट किया कि प्रशासन ने जो पांच मांगें मानी हैं, उन पर भरोसा तभी किया जाएगा जब जमीन पर काम शुरू होगा. भटनागर ने कहा अधिकारी पहले भी कई बार ऐसे वादे कर चुके हैं, जो फाइलों में दबकर रह गए. हमने प्रशासन को 10 दिन का अल्टीमेटम दिया है. जब तक जमीनी स्तर पर कार्रवाई नहीं दिखती, आंदोलन खत्म नहीं होगा.

भविष्य की अनिश्चितता

फिलहाल अधिकारी खाली हाथ लौट चुके हैं और किसान अब भी नदी के किनारे डटे हुए हैं. यह आंदोलन केवल मुआवजे की लड़ाई नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों के अस्तित्व का सवाल है जिनकी पहचान इस मिट्टी से जुड़ी है. अब देखना यह होगा कि क्या सरकार विकास के इस भव्य प्रोजेक्ट में इन अन्नदाताओं के आंसुओं की कीमत समझेगी या फिर ये किसान कागजी वादों के जाल में ही उलझे रह जाएंगे.

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