Middle East Frozen Conflict: अगर आप सोच रहे हैं कि मिडिल ईस्ट में शांति हो गई है, तो ज़रा रुकिए. आज आपको वो 3 कारण बताएंगे जिनकी वजह से ये तनाव कभी कम नहीं होगा.
21 April, 2026
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच एक वीक सीजफायर तो लागू है, लेकिन शांति की बातचीत में कोई खास प्रोग्रेस नहीं दिख रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि ये वॉर आखिर किस दिशा में जा रही है? एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस वक्त एक ‘फ्रोजन कॉन्फ्लिक्ट’ की सबसे ज्यादा संभावना है. आसान भाषा में कहें तो ये एक ऐसी सिचुएशन है जहां वॉर पूरी तरह खत्म नहीं होती, बल्कि एक लो लेवल पर जारी रहती है. ये तब होता है जब एक व्यापक राजनीतिक समझौता नहीं हो पाता. उदाहरण के लिए, साल 2014 से 2022 के बीच ईस्ट यूक्रेन की स्थिति ऐसी ही थी, जिसे ‘फ्रोजन’ माना गया था. भले ही वहां छिटपुट हिंसा और साइबर वॉर जारी थी.
ऐसे में आज आपको वो 3 बड़े कारण बताएंगे जिनकी वजह से अमेरिका-इजरायल और ईरान का ये मामला शांति की ओर नहीं, बल्कि ‘फ्रोजन’ होने की तरफ बढ़ रहा है.
सीजफायर ही जीत है!
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति का एक खास पैटर्न रहा है. वो सीजफायर को एक लंबी बातचीत की शुरुआत नहीं, बल्कि सक्सेस के रूप में देखते हैं. वो एक बार सीजफायर की अनाउंसमेंट कर देते हैं और फिर अगले ग्लोबल इश्यूज पर बढ़ जाते हैं. ट्रंप दावा करते हैं कि उन्होंने लेबनान और ईरान सहित 10 लड़ाई खत्म करवाई हैं, लेकिन हकीकत ये है कि बुनियादी मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं. भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले साल की झड़प के बाद भी सिचुएशन ऐसी ही है कि, वॉर टल गई, पर तनाव बरकरार है.
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लड़ाई सुलझाना मुश्किल
ये वॉर गैर-बराबरी वाली है. एक तरफ अमेरिका और इजरायल की बड़ी मिलिट्री पावर है, तो दूसरी तरफ ईरान अपनी लिमिटेड शक्ति के साथ अलग पैंतरे अपना रहा है. ईरान ने सीधे वॉर के बजाय तेल की सप्लाई रोकने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बैन करने जैसे हथकंडे अपनाए हैं. ऐसी लड़ाइयों में कमजोर पक्ष सीधे तौर पर नहीं जीत सकता, इसलिए वो ताकतवर पक्ष यानी अमेरिका को आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से थकाकर पीछे हटने पर मजबूर करता है. ईरान ने सीजफायर के लिए सिर्फ अपने अस्तित्व को बचाने के लिए हामी भरी है, न कि वॉर को पूरी तरह खत्म करने के लिए. ये कुछ वैसा ही है जैसा अफगानिस्तान में तालिबान ने किया था. वहां भी 20 साल तक संघर्ष को ‘फ्रीज’ रखा और अमेरिका के निकलते ही वापस कब्जा कर लिया.
परमाणु मुद्दे
सबसे बड़ी समस्या ईरान का परमाणु कार्यक्रम है. वाशिंगटन के लिए पाकिस्तान में हुई बातचीत इसलिए विफल रही क्योंकि ईरान अपने परमाणु अधिकारों पर समझौता करने को तैयार नहीं है. ट्रंप ने साल 2015 के परमाणु समझौते को एकतरफा कहकर रद्द कर दिया था, और अब ईरान पहले से कहीं ज्यादा सख्त रुख अपनाए हुए है.
क्या होगा अंजाम?
अगर ये लड़ाई ‘फ्रोजन’ मोड में रहती है, तो मिडल ईस्ट में अस्थिरता बनी रहेगी. इजरायल और ईरान या अमेरिका और ईरान के बीच टाइम-टाइम पर हिंसा भड़कती रहेगी. ये बिल्कुल वैसा ही होगा जैसे गाजा में हुआ. वहां, अक्टूबर में सीजफायर और होस्टेस की अदला-बदली तो हुई, लेकिन हमास के निशस्त्रीकरण और गाजा के फ्यूचर पर कोई ठोस बात नहीं हो पाई. इतिहास गवाह है कि कोरियाई युद्ध (1953) आज भी कागजों पर ‘फ्रोजन’ है, जिससे नॉर्थ कोरिया को परमाणु हथियार विकसित करने का मौका मिला. इसी तरह, भारत-पाकिस्तान के बीच दशकों से चला आ रहा तनाव हथियारों की होड़ को बढ़ावा देता है. मिडल ईस्ट में भी एक ‘फ्रोजन कॉन्फ्लिक्ट’ का मतलब है-हथियारों की एक नई रेस और समुद्री रास्तों पर कब्जे को लेकर कभी न खत्म होने वाला तनाव.
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News Source: PTI
