Home Latest News & Updates 34 साल का राज और शून्य पर अंत: पश्चिम बंगाल में वाम दलों के पतन की कहानी, वामपंथी वोट बैंक पर नजर

34 साल का राज और शून्य पर अंत: पश्चिम बंगाल में वाम दलों के पतन की कहानी, वामपंथी वोट बैंक पर नजर

by Rajnish Sinha
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34 साल का राज और शून्य पर अंत: पश्चिम बंगाल में वाम दलों के पतन की कहानी

Bengal Assembly Elections: बंगाल विधानसभा चुनाव एक बार फिर दिलचस्प राजनीतिक समीकरण की ओर बढ़ रहा है. इस पूरे समीकरण में अहम भूमिका वाम मोर्चा के मतदाताओं की है.

Bengal Assembly Elections: बंगाल विधानसभा चुनाव एक बार फिर दिलचस्प राजनीतिक समीकरण की ओर बढ़ रहा है. इस पूरे समीकरण में अहम भूमिका वाम मोर्चा के मतदाताओं की है. बंगाल में वाम दल के सत्ता से बेदखल होने के बाद इस वोट बैंक पर ममता बनर्जी की भी दावेदारी रही और भाजपा की नजर भी पिछले एक दशक से इस वोट बैंक को अपने पाले में करने की रही है. अब सवाल ये कि वाम के वोटर ममता बनर्जी के साथ या फिर नारा जय श्री राम का. पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी जिस लाल झंडे की तूती बोलती थी, आज वह पूरी तरह से हाशिए पर है. साल 2011 में जब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने वाम मोर्चे के 34 साल के शासन को उखाड़ फेंका था, तब भी वाम दलों के पास अपना 40 प्रतिशत वोट बैंक सुरक्षित था. मगर एक दशक में ये मजबूत किला ढह गया.

2019 में तीन संसदीय सीटों पर सिमटा वाम दल

2014 में वाम मोर्चा का वोट शेयर करीब 30 प्रतिशत था. 2016 के विधानसभा चुनाव में घटकर 20.1 प्रतिशत हो गया और 26 सीट पर जीत मिली. 2019 के लोकसभा चुनाव में वाम दलों का वोट प्रतिशत 7.5 प्रतिशत और तीन संसदीय सीट पर वाम दल सिमट गए. इसी दौरान भाजपा का वोट शेयर बढ़कर करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच गया और पार्टी को 18 सीट मिली. 2021 के विधानसभा चुनाव में वाम दल खाता नहीं खोल सके और वोट शेयर 5 प्रतिशत पहुंच गया जबकि भाजपा 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्ष बनकर उभरी. इन आंकडों को देखकर अंदाजा इस बात का तो लग जाता है कि वाम का किला वक्त के साथ ढह गया. लगातार 34 सालों तक सत्ता के शिखर पर रहने के कारण पार्टी के नेताओं और कैडरों को सत्ता की आदत हो गई थी और कई निर्णय बंगाल के लोगों को रास नहीं आ रहा था. जब 2011 के बाद तृणमूल ने जमीन पर अपना वर्चस्व बनाना शुरू किया, तो वाम दल के कैडर के लिए अपना वजूद बचाना मुश्किल हो गया.

वामपंथी कार्यकर्ताओं की तरफ बढ़ा भाजपा का रुझान

वाम दलों की ताकत उसका संगठित कैडर रहा है. संगठन कमजोर होने के साथ ही इसका बड़ा हिस्सा निष्क्रिय हुआ. कुछ कैडर तृणमूल के तरफ हो लिए और कुछ भाजपा में शामिल हो गए. सीपीआई एम के सांसद अमरा राम ने स्वीकार किया कि कैसे 34 साल तक बंगाल में शासन करने वाला वामदल वक्त के साथ कमजोर होता चला गया. मगर इन्हें विश्वास है कि अब जो मतदाता वाम दलों से दूर गए हैं वे वापस लौटेंगे और इस चुनाव में वाम मोर्चा वापसी करेगी. भारतीय जनता पार्टी अब ये समझ रही है कि तृणमूल को सत्ता से बेदखल करने के लिए वामपंथी विचारधारा वाला वोट बैंक मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की रणनीतिक कुंजी साबित हो सकता है. बताया जा रहा है कि भाजपा ने ऐसे वामपंथी कार्यकर्ताओं की पहचान शुरू की है, जो या तो सक्रिय राजनीति से दूर हैं या अपनी पार्टी से असंतुष्ट या निराश हैं. स्थानीय कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया गया है कि वे इन मतदाताओं से सीधे संवाद स्थापित करें और उन्हें भाजपा के पक्ष में मतदान के लिए प्रेरित करें.

बीजेपी ही रोक सकती है वाम दल को

भाजपा इस फिराक में भी है कि विपक्षी वोटों का बिखराव सत्ताधारी दल को सीधा फायदा पहुंचा सकता है. बंगाल में लाल से भगवा का यह झुकाव 2011 के बाद धीरे-धीरे उभरा. भाजपा के प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ये मानते हैं कि वाम दल को बंगाल से केरल तक बीजेपी ही बाहर कर सकती है और वाम दल और तृणमूल का विकल्प बीजेपी ही है. भाजपा अब मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में इस कैडर क्षमता का उपयोग भी कर रही है. हालांकि, हालिया उपचुनावों और निकाय चुनावों में वाम वोटों की आंशिक वापसी के संकेत मिले हैं. वाम दल भी अपने आधार को पुनर्जीवित करने में जुटे हैं साथ ही ममता बनर्जी ने भी इस कैडर में अच्छी पकड़ बनाई है. जानकार ये भी बता रहे कि भाजपा के लिए इस वोट बैंक को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा. भाजपा के लिए वाम वोट केवल संख्या नहीं, बल्कि सत्ता तक पहुंचने का रास्ता होगा. 2026 का चुनाव तय करेगा कि यह लाल वोट बैंक भगवा का स्थायी बदलाव बनाता है, ममता दीदी पर फिर विश्वास दिखाता है या फिर वाम वोट बैंक वामपंथ वापस करा पाता है.

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