सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत की गरिमा सर्वोपरि है. न्यायाधीश को धमकी देने वाले वकील पर सीजेआई भड़क गए. कहा कि अगर आंखें दिखाना चाहते हैं तो दिखाएं, हम जानते हैं कैसे निपटना है.
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ‘हद पार मत करो’ कहना वकील को पड़ा भारी, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार के एक वकील के मामले को स्वतः संज्ञान लेते हुए अवमानना की कार्यवाही के तहत उच्च न्यायालय के समक्ष बिना शर्त माफी मांगने को कहा. यह कार्यवाही अदालत में हुई एक घटना पर की गई है, जिसमें वकील ने एक न्यायाधीश से कहा था कि ‘हद पार मत करो’. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए महेश तिवारी को पांच न्यायाधीशों की उच्च न्यायालय पीठ के समक्ष बिना शर्त माफीनामा दाखिल करने की अनुमति दी. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष अक्टूबर में वकील के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी किया था. शीर्ष न्यायालय ने उच्च न्यायालय से माफी पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का अनुरोध किया. पीठ ने आदेश दिया कि आपराधिक अवमानना नोटिस से व्यथित याचिकाकर्ता हमारे समक्ष उपस्थित है.
याचिकाकर्ता बिना शर्त माफी मांगने को तैयार
उन्होंने स्पष्ट किया है कि याचिकाकर्ता का इरादा माननीय न्यायाधीश का अनादर करना या न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालना नहीं था. वरिष्ठ अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया है कि याचिकाकर्ता अत्यंत पश्चातापी है और बिना शर्त माफी मांगने को तैयार है. उपरोक्त रुख को ध्यान में रखते हुए हम याचिकाकर्ता को उच्च न्यायालय के समक्ष बिना शर्त माफी का हलफनामा प्रस्तुत करने की अनुमति देते हुए इस मामले का निपटारा करते हैं. हम उच्च न्यायालय से माफी पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का अनुरोध करते हैं. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने कहा कि याचिकाकर्ता बेहद पश्चाताप कर रहा है और बिना शर्त माफी मांगने को तैयार है. हालांकि पीठ ने वकील के आचरण पर कड़ी आपत्ति जताई. मुख्य न्यायाधीश ने वकील के रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह न्यायाधीशों के सामने इसका स्पष्टीकरण क्यों नहीं दे सकते? यह उनका हठी स्वभाव है. उन्हें न्यायाधीशों का सामना करने दीजिए. उन्हें स्पष्टीकरण देने दीजिए. अगर वह अपनी आंखें दिखाना चाहते हैं तो दिखाएं, फिर हम देखेंगे. हम जानते हैं कि इससे कैसे निपटना है.
बिजली कनेक्शन पर कर रहा था बहस
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने भी न्यायालय के शिष्टाचार के गिरते स्तर का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के हर स्तर पर ऐसे मुद्दे हैं जहां टकराव पैदा करना पेशेवर गौरव का विषय बन जाता है. दवे ने कहा कि लाइव-स्ट्रीमिंग कार्यवाही के युग ने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. कहा कि न्यायालय की सुनवाई की ये वीडियो कार्यवाही एक अभिशाप बन गई है. वकील को नोटिस मिलना ही उसका करियर बर्बाद करने के लिए काफी है. यह विवाद पिछले साल 16 अक्टूबर को झारखंड उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति राजेश कुमार के समक्ष हुई सुनवाई के दौरान शुरू हुआ था. एक वकील बिजली कनेक्शन बहाल कराने के अपने मुवक्किल के केस पर बहस कर रहा था. उसने 25,000 रुपये की जमा राशि दी, लेकिन अदालत ने पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कुल बकाया राशि का 50 प्रतिशत जमा करने का आदेश दिया. हालांकि मामला अंततः 50,000 रुपये की जमा राशि पर सुलझ गया, लेकिन मामला समाप्त होने के बाद स्थिति और बिगड़ गई.
झारखंड राज्य बार काउंसिल से शिकायत
बताया जाता है कि न्यायमूर्ति कुमार ने वकील के तर्क देने के तरीके पर टिप्पणी की और झारखंड राज्य बार काउंसिल के अध्यक्ष को उनके आचरण का संज्ञान लेने के लिए कहा. इसके जवाब में वकील ने पीठ से संपर्क किया और जोर देकर कहा कि वह अपने तरीके से बहस करेगा और न्यायाधीश से कहा कि “सीमा पार न करें.” लाइव-स्ट्रीम की गई कार्यवाही के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद, रंगोन मुखोपाध्याय, आनंद सेन और राजेश शंकर की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया और वकील को नोटिस जारी किया.
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News Source: Press Trust of India (PTI)
