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मिशन 2027: 21% वोट बैंक पर सबकी नजर, मायावती के गढ़ में अखिलेश और कांग्रेस की घेराबंदी, BJP भी पीछे नहीं

by DheerajTripathi
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मिशन 2027: 21% वोट बैंक पर सबकी नजर, मायावती के गढ़ में अखिलेश और कांग्रेस की बड़ी घेराबंदी

UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांशीराम जयंती (15 मार्च) को लेकर दलित वोट बैंक पर सियासी घमासान तेज हो गया है. सपा, बसपा और कांग्रेस दलित समाज को साधने की पूरी कोशिश में जुटे हुए हैं.

UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांशीराम जयंती (15 मार्च) को लेकर दलित वोट बैंक पर सियासी घमासान तेज हो गया है. बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की जयंती के अवसर पर प्रमुख दल समाजवादी पार्टी (सपा), बसपा और कांग्रेस पार्टी दलित समाज को साधने की पूरी कोशिश में जुटे हुए हैं. दलित वोट यूपी में लगभग 21 प्रतिशत है, जो कई विधानसभा और लोकसभा सीटों पर निर्णायक साबित होता है, खासकर 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले यह मुद्दा और गरमा गया है. समाजवादी पार्टी ने इस बार कांशीराम जयंती को पीडीए दिवस (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के रूप में मनाने का ऐलान किया है. पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने यह घोषणा करते हुए साफ संकेत दिया है कि आगामी चुनावों को देखते हुए सपा अपने पीडीए फॉर्मूले को और मजबूत करना चाहती है. दरअसल सपा की नजर लंबे समय से बहुजन समाज पार्टी के पारंपरिक दलित वोट बैंक पर है.

हर जिले में सपा मनाएगी कांशीराम जयंती

बीते कुछ वर्षों में मायावती की पार्टी बसपा का राजनीतिक प्रभाव कमजोर पड़ने और कई पुराने नेताओं के अन्य दलों में जाने के बाद सपा को इसमें अवसर दिखाई दे रहा है. इसी रणनीति के तहत सपा कांशीराम जयंती को बड़े स्तर पर मनाने जा रही है ताकि दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत की जा सके. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सभी जिलों में कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश दिए हैं. उन्होंने कहा कि मुझे खुशी है कि पीडीए की आवाज और मजबूत होने जा रही है. इंडिया गठबंधन मिलकर काम कर रहा है. सपा के दलित नेता मिठाई लाल भारती ने कहा कि पूरे प्रदेश में कार्यक्रम करके दलित समाज को जोड़ा जाएगा. समाजवादी पार्टी सभी जिलों में कार्यक्रम आयोजित करेगी, सपा की यह रणनीति स्पष्ट रूप से बसपा के पारंपरिक दलित वोट बैंक पर नजर रखती है, जहां मायावती की पार्टी का प्रभाव कमजोर पड़ने के बाद कई नेता अन्य दलों में चले गए हैं. 2024 लोकसभा चुनाव में पीडीए फॉर्मूले की सफलता के बाद अखिलेश यादव इसे और मजबूत करने में जुटे हैं.

राहुल भी जोड़ रहे दलितों को

बसपा भी अपनी पारंपरिक पकड़ बनाए रखने के लिए कमर कस रही है. पार्टी ने लखनऊ में बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी की है, साथ ही लखनऊ चलो अभियान चलाया जा रहा है. बसपा का संदेश साफ है कि दलित राजनीति की असली प्रतिनिधि वही है. कांग्रेस ने भी इस मुकाबले में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने लखनऊ में दलित समाज के साथ संवाद किया और संविधान सम्मेलन के माध्यम से दलितों को जोड़ने की कोशिश की. कांग्रेस के संगठन महासचिव अनिल यादव ने लाइव टाइम्स से कहा कि यह वोट बैंक की बात नहीं है. कांशीराम उत्तर भारत में अकेले ऐसे नेता थे जो जमीन पर रहे और बहुजनों को सत्ता तक पहुंचाया. राहुल गांधी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों को बराबर हिस्सेदारी चाहते हैं. पूर्व सांसद कमल किशोर कमांडो ने कहा कि जो दलित भाई बिछड़ गए थे, उन्हें वापस लाया जाएगा और राहुल गांधी के नेतृत्व में सब मिलकर चुनाव लड़ेंगे.

सियासी जंग में बीजेपी भी पीछे नहीं

राजनीतिक विश्लेषक राजेंद्र गौतम का मानना है कि 2027 के चुनाव में फोकस दलित वोट बैंक पर है. 2024 के बाद सपा को लगा कि बसपा का निकला वोट वापस लाया जा सकता है, लेकिन कांग्रेस भी संविधान और समानता के मुद्दे पर पुराना वोट बैंक लौटाने की कोशिश कर रही है. भाजपा भी दलित वोट साधने में पीछे नहीं है और पूरे प्रदेश में कांशीराम जयंती मनाने की तैयारी कर रही है. विश्लेषकों का कहना है कि अगर दल सही प्रयास नहीं करेंगे तो वोट बैंक बिखर सकता है. कुल मिलाकर कांशीराम जयंती इस बार महज एक सामाजिक आयोजन नहीं रह गई, बल्कि दलित वोट बैंक की राजनीति का बड़ा मंच बन गई है. आने वाले दिनों में देखना होगा कि सपा का पीडीए फॉर्मूला, बसपा की पारंपरिक ताकत, कांग्रेस का संविधान बचाओ अभियान या भाजपा की पहुंच, कौन दलित समाज को सबसे ज्यादा प्रभावित कर पाता है. यह सियासी जंग 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों की दिशा तय करने वाली साबित हो सकती है.

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