Nagaur News : मेड़ता उपखंड के कड़वासरो की ढाणी में शनिवार को पूरा गांव भावुक हो उठा. 13 ग्रेनेडियर्स बटालियन के 24 जवान विशेष रूप से नागौर पहुंचे.
- नागौर से केशा राम की रिपोर्ट
नागौर के मेड़ता उपखंड के कड़वासरा की ढाणी कहानी जब शहीदों के साथी वादा निभाते हैं, तो आंखों में आंसू और सीने में गर्व एक साथ उमड़ पड़ता है. राजस्थान के नागौर जिले में ऐसा ही दृश्य देखने को मिला, जब भागीरथ कड़वासरा की बेटी सुष्मिता की शादी में उनके 13 ग्रेनेडियर्स के 24 साथी जवान ‘पिता’ बनकर पहुंचे. यह सिर्फ एक शादी नहीं थी. यह फौजी भाईचारे, कर्तव्यनिष्ठा और वचन की मर्यादा का जीवंत उदाहरण था.
क्या है पूरा मामला?
मेड़ता उपखंड के कड़वासरो की ढाणी में शनिवार को पूरा गांव भावुक हो उठा. 13 ग्रेनेडियर्स बटालियन (गंगानगर-जैसलमेर सेक्टर) के 24 जवान विशेष रूप से नागौर पहुंचे. कमान अधिकारी कर्नल सोमेन्द्र कुमार, अन्य अधिकारी और सेवानिवृत्त कर्नल सुरेश चंद्र राणा भी इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बने. जवानों ने दुल्हन सुष्मिता को गोद में बिठाया, कन्यादान किया, फेरे लगवाए और आशीर्वाद दिया. हर वह रस्म निभाई जो एक पिता निभाता है. विदाई के समय जवानों की आंखें नम थीं. गांव की आंखें भीगी थीं और माहौल में गर्व का सैलाब था.
जो वादा किया उसे निभाया
एक ग्रामीण ने भावुक होकर कहा कि आज के समय में लोग अपने रिश्ते निभाने से कतराते हैं, लेकिन सेना ने दिखा दिया कि वादा क्या होता है. शहीद की शौर्य गाथा- भागीरथ कड़वासरा का जन्म 10 जनवरी 1978 को नागौर जिले के इसी गांव में हुआ. 1995 में वे भारतीय सेना की 13 ग्रेनेडियर्स में भर्ती हुए. 8 जून 2002 को असम के मिलनपुर गांव में आतंकवादियों से मुकाबले के दौरान उन्होंने अदम्य साहस दिखाया और वीरगति को प्राप्त हुए. उनकी बहादुरी के लिए 26 मार्च 2003 को उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया. उनके पीछे पत्नी संतोष देवी और नन्ही बेटी सुष्मिता रह गई थीं. उस समय साथियों ने वादा किया था, तुम्हारी बेटी की हर खुशी में हम साथ रहेंगे और शनिवार को वह वादा निभाया गया.
मां की आंखों में दिखा गर्व
शहीद की मां की आंखों में गर्व और पत्नी संतोष देवी की आंखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर गर्व साफ झलक रहा था. उन्होंने कहा कि भागीरथ जी चले गए, लेकिन उनके साथी आज भी हमारे परिवार हैं. जवानों ने दिया का संदेश जवानों ने एक स्वर में कहा कि शहीद साथी का वादा हमेशा जिंदा रहेगा. ये कहानी सिर्फ एक शादी की नहीं है बल्कि उस फौजी परंपरा की कहानी है जहां ‘रक्त से नहीं, रिश्तों से भाईचारा’ निभाया जाता है. सीमा पर दुश्मन से लड़ने वाले ये जवान, घर लौटकर भी अपने शहीद साथी का परिवार नहीं भूलते. भागीरथ कड़वासरा अमर हैं. उनका साहस अमर है और उनका वादा निभाने वाले साथी भी अमर हैं.
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