Ola-Uber Drivers on Strike: आपने शायद आज गौर कियो हो तो, सड़कों पर ओला, ऊबर और रैपिडो की कैब मिसिंग है. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि आज लाखों ड्राइवर्स स्ट्राइक पर हैं.
7 February, 2026
आज यानी 7 फरवरी को अगर आप ऑफिस जाने या किसी जरूरी काम के लिए अपने फोन पर कैब बुक करने की कोशिश कर रहे हैं तो, आपको ‘नो कैब्स अवेलेबल’ दिखेगा. दरअल, इसकी एक बड़ी वजह है कि देश भर में ओला, उबर, रैपिडो और पोर्टर जैसे ऐप बेस्ड प्लेटफॉर्म्स के लाखों ड्राइवर्स आज हड़ताल पर हैं. ड्राइवरों के ऑर्गनाइजेशन ने इस विरोध प्रदर्शन को ‘ऑल इंडिया ब्रेकडाउन’ का नाम दिया है. उनका कहना है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है और वो इस शोषण को और बर्दाश्त नहीं करेंगे.
ड्राइवरों का दर्द
कई बड़े यूनियनों ने केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को एक लेटर लिखा है. उन्होंने क्लियर कहा है कि जहां एक तरफ ये बड़ी कंपनियां मोटा मुनाफा कमा रही हैं, वहीं इन एप्स के भरोसे अपनी रोजी-रोटी चलाने वाले लाखों ड्राइवर गरीबी की दलदल में धंसते जा रहे हैं. अब इस हड़ताल की 4 बड़ी वजह बताई जा रही हैं.
मनमाना किराया
ड्राइवरों की सबसे पहली और बड़ी शिकायत ये है कि उनके काम के लिए सरकार की तरफ से कोई तय फेयर स्ट्रक्चर नहीं है. बड़ी कंपनियां अपनी मर्जी से किराया तय करती हैं. ड्राइवरों का कहना है कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों और गाड़ियों की मेंटेनेंस के बीच उनकी बचत न के बराबर रह गई है. यूनियन की मांग है कि सरकार इसमें दखल दे और एक मिनिमम बेस किराया तय करे, जिससे ड्राइवरों को अपनी मेहनत का सही अमाउंट मिल सके.
नियमों की मांग
ड्राइवरों ने सरकार से मांग की है कि ‘मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस 2025’ को सख्ती से लागू किया जाए. इस नियम के तहत एक सरकारी ओवरसियर की नियुक्ति की बात कही गई है, जो ये सुनिश्चित करेगा कि किराए में ट्रांसपेरेंसी बनी रहे और ड्राइवरों के राइट्स बने रहें. इसके अलावा ड्राइवर्स का कहना है कि जब तक कोई सरकारी निगरानी नहीं होगी, कंपनियां उनका इसी तरह शोषण करती रहेंगी.
नंबर प्लेट
कमर्शियल काम के लिए प्राइवेट गाड़ियों का इस्तेमाल भी एक प्रोब्लम है. ड्राइवरों की मांग है कि प्राइवेट कार्स को सवारी ढोने या सामान पहुंचाने के काम में इस्तेमाल करने पर पूरी तरह रोक लगाई जाए. अगर कोई अपनी प्राइवेट गाड़ी का कमर्शियल इस्तेमाल करना चाहता है, तो उसे अपनी गाड़ी को कमर्शियल कैटेगरी में बदलना होगा. इससे उन ड्राइवरों को फायदा होगा जो टैक्स और परमिट का भारी खर्च उठाकर अपनी पीली नंबर प्लेट वाली गाड़ियां चला रहे हैं.
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पैनिक बटन
वैसे, इस बार ड्राइवरों की नाराजगी की एक बड़ी वजह ‘पैनिक बटन’ भी है. ड्राइवरों का कहना है कि गाड़ियों में पैनिक बटन लगाना उनके लिए बड़ी मुसीबत बन गया है. यूनियन के दावों के मुताबिक, केंद्र सरकार ने पैनिक बटन डिवाइस के लिए 140 कंपनियों को मंजूरी दी थी. हालांकि, अब राज्य सरकार ने इनमें से लगभग 70 प्रतिशत कंपनियों को अवैध घोषित कर दिया है. इसकी मार सीधे ड्राइवरों पर पड़ रही है. उन्हें पहले से लगे डिवाइस हटवाकर नए डिवाइस लगवाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जिस पर लगभग 12,000 रुपये का खर्च आ रहा है.
बड़ी समस्या
आपको याद होगा कि अभी कुछ टाइम पहले 31 दिसंबर को फूड डिलीवरी करने वाले वर्कर्स ने भी इसी तरह की हड़ताल की थी. उस टाइम ब्लिंकिट और ज़ेप्टो जैसी कंपनियों को अपनी ’10 मिनट डिलीवरी’ वाली पॉलिसी में बदलाव करना पड़ा था क्योंकि इससे ड्राइवरों पर भारी दबाव बन रहा था. अब कैब ड्राइवर्स की इस हड़ताल ने सरकार और कंपनियों के सामने फिर से वही सवाल खड़े कर दिए हैं. आम जनता के लिए ये हड़ताल एक बड़ी परेशानी लेकर आई है, लेकिन ड्राइवरों का कहना है कि उनके पास अपनी आवाज सुनाने का अब यही एक रास्ता बचा है.
News Source: Press Trust of India (PTI)
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