West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार सिर्फ चेहरे और मुद्दे नहीं, बल्कि नारे भी बदले हुए नजर आ रहे हैं. “जय श्री राम” से “जय मां काली” और “जय मां दुर्गा” तक का ये बदलाव.
West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार सिर्फ चेहरे और मुद्दे नहीं, बल्कि नारे भी बदले हुए नजर आ रहे हैं. “जय श्री राम” से “जय मां काली” और “जय मां दुर्गा” तक का ये बदलाव. दरअसल आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी की नई रणनीति का हिस्सा है. पिछले चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी अब बंगाल की जमीन, संस्कृति और भावनाओं के हिसाब से खुद को ढालने की कोशिश कर रही है. सवाल बड़ा है- क्या नारे बदलने से नतीजे भी बदलेंगे?
भाजपा करेगी मां दुर्गा और कालिका का उद्घोषणा
भाजपा ने साफ संकेत दे दिया है कि 2026 के विधानसभा चुनाव में बंगाल के लिए उसकी रणनीति पहले से अलग होगी. पार्टी नेताओं को निर्देश दिया गया है कि सूबे में “जय श्री राम” के बजाय “जय मां काली” और “जय मां दुर्गा” के उद्घोष को प्राथमिकता दें. इस बदलाव के पीछे सीधा गणित है- पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान. बंगाल में काली पूजा और दुर्गा पूजा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र हैं. बीजेपी अब यह समझ चुकी है कि सिर्फ ‘नेशनल नैरेटिव’ से बंगाल नहीं जीता जा सकता. इसलिए हिंदुत्व को ‘लोकल कलर’ देने की कोशिश हो रही है ताकि पार्टी खुद को बंगाली अस्मिता के करीब दिखा सके. 2021 के चुनाव में बीजेपी ने आक्रामक अभियान चलाया, लेकिन ‘बाहरी पार्टी’ का नैरेटिव उस पर भारी पड़ा. अब 2026 के लिए वही गलती दोहराने से बचने की कोशिश है.
कौन बंगाली अस्मिता के करीब ?
लेकिन विपक्ष इस बदलाव को रणनीतिक मजबूरी बता रहा है. तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी सिर्फ नारे बदल रही है, राजनीति नहीं. बंगाल की राजनीति में “जय श्री राम” को लेकर पहले भी कई बार टकराव हुआ- खासतौर पर ममता बनर्जी और बीजेपी नेताओं के बीच. बीजेपी ममता सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाती रही है, जबकि ममता ने भी हाल के समय में मंदिरों के उद्घाटन और धार्मिक आयोजनों में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है यानी मुकाबला अब सिर्फ बीजेपी बनाम टीएमसी नहीं, बल्कि ‘कौन ज्यादा बंगाली संस्कृति के करीब’-इस पर भी है.
चुनाव में दुर्गा पूजा और काली पूजा समितियों का अहम रोल !
2026 का विधानसभा चुनाव बंगाल में बेहद अहम होने वाला है. एक तरफ ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाने के लिए पूरी ताकत झोंकेंगी, तो दूसरी तरफ बीजेपी ‘लोकलाइज्ड हिंदुत्व’ के सहारे सत्ता का रास्ता तलाश रही है. नारे बदलकर बीजेपी यह संदेश देना चाहती है कि वह अब बंगाल को ‘दिल्ली की नजर’ से नहीं, बल्कि ‘कोलकाता की नजर’ से देख रही है. लेकिन चुनावी सच्चाई यही है कि बंगाल की जनता सिर्फ नारे नहीं, भरोसा भी देखती है. लेकिन बंगाल की राजनीति को जानने वाले राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि मां दुर्गा और मां कालिका को बंगाल में पूरे शिद्दत के पूजा जाता है , साथ ही बड़े जोर शोर से इनका त्यौहार मनाया जाता है. दुर्गा पूजा के समय बड़े बड़े पंडाल बनते हैं. उनके लिए बड़े-बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलप किए जाते हैं. दुर्गा पूजा आयोजन के पूरे बंगाल में बड़ी-बड़ी समितियां है और यह समितियां कई प्रकार के सामाजिक और धार्मिक आयोजन करती है. समाज के प्रभावशाली लोग इस समितियां से जुड़े होते हैं. ऐसे उधर मां कालिका बंगाल के ज़न-जन में मानस में बैठी हैं. रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद जैसे महानविभूति उनसे जुड़े रहे हैं. बंगाल में बीजेपी का यह प्लान निश्चित रूप से एक नई हिंदुत्व एजेंडे की ओर इशारा कर रही है. इसका कितना फायदा होगा कहना मुश्किल है लेकिन एक अच्छी रणनीति का हिस्सा है.
बाहरी बनाम भीतरी की राजनीति को नाकाम करने की कोशिश
पश्चिम बंगाल में TMC हमेशा बंगाली संस्कृति बनाम बाहरी राजनीति” की टक्कर दिखाती रही है. बंगाल में परंपरागत धार्मिक अभिव्यक्ति दुर्गा, काली, सरस्वती से जुड़ी रही है. “जय श्री राम” का नारा अचानक तेज़ी से उभरा, वो भी ज़्यादातर राजनीतिक रैलियों में. इससे तृणमूल कांग्रेस ने नैरेटिव बनाया कि यह नारा बंगाल की ज़मीन से नहीं, बाहर से लाया गया है. 2019 में कई मौकों पर ममता बनर्जी के सामने “जय श्री राम” के नारे लगे. उन्होंने इसे उकसावे और अपमान के तौर पर लिया- और वहीं से यह नारा राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक बन गया यानी नारा आस्था से हटकर पावर प्ले बन गया. नारे का “धार्मिक” से ज़्यादा “राजनीतिक” इस्तेमाल हो गया है. बंगाल में कई लोग खासकर भद्र लोक को लगा कि नारा भक्ति से ज़्यादा प्रदर्शन है, इससे कई आम हिंदू भी असहज हुए, क्योंकि उन्हें लगा धर्म को लड़ाई की भाषा बनाया जा रहा है. अब इस नैरेटिव को बदलना चाहती है. भारतीय जनता पार्टी ने जय श्री राम को हिंदू पहचान की आवाज़ के रूप में पेश किया. वहीं TMC ने इसे बंगाल की साझी संस्कृति पर हमला बताया. नतीजा: नारा एक कल्चरल बॉर्डर लाइन बन गया. इस विवाद की पृष्ठभूमि में TMC “जय बांग्ला”, “जय मां काली”, BJP बाद में “जय मां काली” अपनाने लगी यानी एक ही राज्य में नारों की जंग शुरू हो गई. “जय श्री राम” पर विवाद इसलिए हुआ क्योंकि बंगाल में उसे श्रद्धा नहीं बल्कि राजनीतिक पहचान थोपने की कोशिश के रूप में देखा गया. अब देखना ये है कि “जय मां काली” का नया नारा बीजेपी को सत्ता के करीब ले जाता है या ममता बनर्जी का ‘बंगाली अस्मिता’ कार्ड एक बार फिर भारी पड़ता है.
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