UP Politics: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट बैंक पर कब्जे की होड़ लगी है.
UP Politics: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट बैंक पर कब्जे की होड़ लगी है. शक्तिहीन होती जा रही बहुजन समाज पार्टी की जगह खुद को बड़ा दावेदार बताने में सत्तारूढ़ भाजपा से लेकर मुख्य विपक्षी दल सपा तक सक्रिय है. सपा ने पीडीए के अपने नारे में पिछड़ा के बाद दलित को रखा है तो भाजपा ने भी दलित महापुरुषों के नाम पर बड़ा खेला है. इस रेस में कांग्रेस भी पीछे नहीं है. कांग्रेस ने भी इस बार बसपा के संस्थापक मान्यवर कांशीराम की जयंती मनाई. चुनाव से पहले दलित वोट बैंक को लेकर सियासत इस बार भाजपा सरकार के एक फैसले से गरमा गई है.
अंबेडकर मूर्ति विकास योजना को मंजूरी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में 7 अप्रैल को हुई कैबिनेट की बैठक में समाज कल्याण विभाग द्वारा डॉ.भीमराव अंबेडकर मूर्ति विकास योजना को मंजूरी दी गई. इस योजना के तहत ऐसे सभी सार्वजनिक स्थानों पर जहां बाबा साहेब और अन्य सामाजिक न्याय के ध्वजवाहकों की मूर्तियां लगी हैं, उनके सुदृढ़ीकरण का कार्य किया जाएगा. इसमें मूर्ति, छतरी, बाउंड्रीवाल, सुंदरीकरण, हरियाली और प्रकाश व्यवस्था आदि कार्य कराए जाएंगे. एक मूर्ति पर अधिकतम 10 लाख रुपए खर्च किए जाने का प्रावधान है. योजना में प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के लिए एक करोड़ रुपए की व्यवस्था किया जाना प्रस्तावित है. इस तरह कुल 403 करोड़ का बजट कैबिनेट ने मंजूर किया है.
दलित वोट बैंक पर कब्जे की होड़
जाहिर है कि यह कार्य शुरू होते ही दलित महापुरुषों को लेकर सियासत गरम हो जाएगी. विपक्षी दल घोषणा होते ही इसे दिखावा बताने लगे हैं. उत्तर प्रदेश में दलित लंबे समय से सियासत के केंद्र में हैं. अपने दलित वोट बैंक के साथ सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग करके बसपा सुप्रीमो मायावती ने जब बहुमत की सरकार बनाई तो इसकी अहमियत और बढ़ गई. इससे पहले कांग्रेस ने दलित वोट बैंक को साधकर लंबे समय तक राज किया था. भाजपा ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग में पिछड़ों को खास अहमियत तो दी लेकिन दलितों को साधने में भी पीछे नहीं रही. यूपी की सुरक्षित सीटों पर उसकी आसान विजय इसका एक उदाहरण है. दलितों की एकमुश्त आबादी भले ही ज्यादा है, लेकिन उसे क्षेत्रवार अलग-अलग जातियों में बांटकर सियासी दल अपनी अपनी जमीन मजबूत करते रहे हैं. अब बसपा के कमजोर होने से अन्य दलों की नजर दलितों पर टिक गई है.
वजूद बचाने को अकेले लड़ेगी बसपा
मौजूदा विधानसभा में बसपा के एकमात्र विधायक हैं, वह भी सवर्ण हैं. सीटों के हिसाब से देखें तो बसपा, कांग्रेस से भी नीचे आ गई है. कांग्रेस के वर्तमान में दो विधायक हैं. यही वजह है कि जब सपा और कांग्रेस ने मान्यवर कांशीराम की जयंती मनाई तो बसपा भड़क गई. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी खुद लखनऊ आए और मान्यवर कांशीराम की जयंती के उपलक्ष में आयोजित एक संगोष्ठी को संबोधित किया. बसपा सुप्रीमो मायावती ने ऐसे ही आयोजनों के बाद ऐलान कर दिया कि वह विधानसभा के चुनाव में किसी के साथ गठबंधन नहीं करेंगी. बसपा प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी. उनकी यह घोषणा कहीं न कहीं अपने वोटबैंक को सीधा संदेश देने वाली है कि उनकी पार्टी मैदान से बाहर नहीं है और वह विकल्पों पर विचार न करें.
सपा के पीडीए में सेंध
अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी का भावी चेहरा बनाकर पेश करते हुए उन्होंने यह संदेश भी दिया कि वह भविष्य को लेकर उदासीन नहीं हैं. डॉ. आंबेडकर समेत सभी दलित महापुरुषों पर बसपा अपना एकाधिकार जताती रही है. अब भाजपा के इस नए दांव से वह थोड़ा असहज जरूर होगी. वरिष्ठ पत्रकार मनोज सामना कहते हैं कि भाजपा ने 2027 के विधानसभा चुनाव का एजेंडा सेट कर दिया. अभी विपक्षी दल इसी के इर्द-गिर्द अपनी सियासी जमीन तलाशने में लगे रहेंगे. इस योजना के जरिए भाजपा ने सपा के पीडीए के नारे में बड़ी सेंध लगा दी है. पिछड़ा वर्ग से प्रदेश अध्यक्ष बनाकर वह पहले ही एक बड़ा दांव खेल चुकी है. कुल मिलाकर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में रोचक मुकाबले की जमीन तैयार होने लगी है.
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