Vat Savitri Katha: माता सावित्री ने अपने समर्पण और प्रेम के बल से यमराज से अपने पति के प्राणों की रक्षा की थी. इसी कारण आज भी महिलाएं वट सावित्री का व्रत रखती हैं. यहां पढ़ें वट सावित्री की कथा.
7 May, 2026
हिंदू धर्म में व्रत रखने का बहुत महत्व है. महिलाएं अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं. इसी तरह सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए वट सावित्री का व्रत रखती हैं. यह उनके लिए बहुत खास महत्व रखता है. वट सावित्री का व्रत माता सावित्री और उनके पति सत्यवान की कथा से जुड़ा है. माता सावित्री ने अपने समर्पण और प्रेम के बल से यमराज से अपने पति के प्राणों की रक्षा की थी. इसी कारण आज भी महिलाएं वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ के नीचे पूजा करती हैं और वट सावित्री की कथा पढ़ती हैं. चलिए जानते हैं वट सावित्री की अद्भुत कथा क्या है.

पढ़ें वट सावित्री की कथा
मद्र देश के राजा का नाम अश्वपति था. उनकी कोई संतान नहीं थी. संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने देवी सावित्री का व्रत किया, जिसके बाद उनकी रानी ने एक कन्या को जन्म दिया. देवी सावित्री के आशीर्वाद और उनकी पूजा के बाद पैदा हुई बेटी का नाम भी सावित्री रखा गया. समय के साथ वह कन्या बड़ी हो गई. तब राजा ने अपने मंत्रियों से उसके विवाह के बारे में सलाह ली.
इसके राजा ने अपनी पुत्री सावित्री को बुलाया और कहा- हे पुत्री! तुम्हें योग्य वर को देने का समय आ गया है. मैं तुम्हारे योग्य कोई वर ढूंढ नहीं पा रहा हूं. इसलिए तुम मंत्रियों के साथ जाओ और खुद अपने वर को चुनो. सावित्री ने ऐसा ही किया. जब वह वापस घर लौटी और उसने अपने पिता से कहा- शाल्व देश में एक क्षत्रिय राजा हैं, जिनका नाम नेक द्युमत्सेन है. वे जन्म से ही नेत्रहीन हैं. रुक्मी नाम के एक सामंत ने उनका राज्य हड़प लिया है. वह अपने बेटे और पत्नी के साथ जंगल में रह रहे हैं. उनका बेटा सच्चा और नेक है. मैंने उसे अपना पति चुना है.
जब सावित्री ने अपने पिता से सारी बातें कही, उस समय सभा में राजा के साथ नारद जी भी बैठे थे. सावित्री की बात सुनकर वे तुरंत बोले- हे राजन! सावित्री ने बहुत बुरा काम किया है. बचपने में उसने सत्यवान को नेक मानकर चुन लिया, लेकिन आज से ठीक एक साल बाद सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी. इस पर सावित्री ने कहा- दीर्घायु हो या अल्पायु, वर एक ही बार चुना जाता है. अब मैं दूसरे वर को नहीं चुन सकती.
सावित्री के हठ के बाद राजा ने सत्यवान के साथ उनका विवाह करवा दिया. इसके बाद सावित्री सत्यवान के आश्रम में खुशी से रहने लगी और नारदजी के कहे अनुसार हर दिन गिनने लगी. जब सत्यवान के मृत्यु का समय नजदीक आ गया, तब सावित्री ने कुछ दिन पहले से ही व्रत करना शुरू कर दिया. आखिरी दिन सावित्री और सत्यवान और जंगल में लकड़ी काट रहे थे. अचानक सत्यवान को सिर में दर्द होने लगा. सावित्री ने उसे अपनी गोद में सुला लिया.
उस समय सावित्री ने देखा कि देवों जैसा सूर्य के समान दिखने वाला एक सांवला पुरुष उसके सामने खड़ा था. सावित्री ने उन्हें प्रणाम किया और पूछा कि वह कौन हैं. जवाब आया, “मैं यम हूं, जो सभी प्राणियों को डराता है और जो उनके कर्मों के अनुसार सही सजा देता है. इसलिए, हे पतिव्रता सावित्री, तुम्हारे पति, जो लेटे हुए हैं, उनकी मृत्यु हो चुकी है. यम के दूत उन्हें नहीं ले जा पाएंगे, इसलिए मैं खुद आया हूं.”

यह कहकर, यमराज ने सत्यवान के शरीर से अंगूठे के आकार की आत्मा को जबरदस्ती निकाल दिया. फिर वह यमपुरी की ओर चलने लगे. सावित्री भी यम के पीछे-पीछे चली गईं. यम ने सावित्री से कहा कि कोई भी आत्मा यम के रास्ते से बिना अपनी आयु पूरी किए नहीं गुजर सकती. सावित्री ने यम से कहा कि उन्हें उनके साथ जाने में कोई शर्म या पछतावा नहीं है. इसके अलावा, इस धरती पर महिलाओं के लिए उनके पति के अलावा कोई और जगह नहीं है. इसलिए, वह उनके पीछे-पीछे चली गईं. सावित्री की मीठी बातें सुनकर यम ने कहा, “मैं तुम्हारी बातों से प्रसन्न हूं, इसलिए तुम मुझसे अपने पति के प्राणों के अलावा कोई भी तीन वरदान मांगो.”
तब सावित्री ने यमराज से पहला वरदान मांगा- अपना खोया हुआ राज्य. इसके बाद उसने अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी मांगी. तीसरे वरदान में उसने चतुराई से सौ पुत्रों का वरदान मांग लिया. अब यमराज अपने ही वरदान में फंस चुके थे. उन्होंने सत्यवान की आत्मा को मुक्त कर दिया और सावित्री को लौटा दिया. सावित्री अपने पति के साथ आश्रम लौट आई. सावित्री ने सावित्री देवी का व्रत रखा, जिससे उसके सास-ससुर की आंखों की रोशनी वापस आ गई. उसे अपना राज्य भी मिल गया और उसके सौ बेटे हुए. यह सब कुछ वट वृक्ष के नीचे ही हुआ था, जिस कारण वट वृक्ष की पूजा की जाती है.
यह भी पढ़ें- 19 साल बाद बना दुर्लभ योग, ज्येष्ठ माह में पड़ेंगे 8 बड़े मंगलवार, जानें सभी की तिथि और सही पूजा विधि
