Home Latest News & Updates 2025 में धीमी पड़ी ड्रैगन की चाल, ग्रोथ की पटरी पर भारत ने पकड़ी बुलेट ट्रेन वाली रफ़्तार!

2025 में धीमी पड़ी ड्रैगन की चाल, ग्रोथ की पटरी पर भारत ने पकड़ी बुलेट ट्रेन वाली रफ़्तार!

by Preeti Pal
0 comment
2025 में धीमी पड़ी ड्रैगन की चाल, ग्रोथ की पटरी पर भारत ने पकड़ी बुलेट ट्रेन वाली रफ़्तार!

Introduction

31 December, 2025

Indian GDP Growth in 2025: इस साल भारत की इकॉनमी की ग्रोथ रेट ना सिर्फ फास्ट, बल्कि दुनिया में सबसे फास्टेस्ट रही. साउथ से लेकर पूरबी दुनिया तक भारत सबसे तेज स्पीड से आगे बढ़ रहा है. यहां तक कि अमेरिका जैसे सुपरपावर देश को चुनौती देने वाले चीन की रफ्तार भी आज हिंदुस्तान से धीमी नजर आ रही है. यानी सबसे आगे हम हिंदुस्तानी दौड़ रहे हैं. इस वक्त भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 4.19 ट्रिलियन डॉलर के करीब है. इस लिहाज से भारत फिलहाल दुनिया की चौथी बडी़ अर्थव्यवस्था है. 2027 तक जर्मनी को पीछे छोड़कर भारत तीसरे नंबर पर पहुंचने के बहुत करीब है. 2025 में भारत की तेज रफ्तार ने ना सिर्फ दुनिया को चौंकाया है, बल्कि RBI के अनुमान को भी पीछे छोड़ दिया. इस वक्त दुनियाभर की तमाम रेटिंग एजेंसियां हों या वित्तीय संस्थान सबको भारत की ग्रोथ स्टोरी में मजबूत भरोसा है. इसमें IMF, WORLD BANK से लेकर मूडीज और Goldman Sachs जैसे तमान बड़े नाम शुमार हैं. 2025 में भले ही भारत ने विकास के मोर्चे पर दुनिया को राह दिखाई हो, लेकिन ऐसे कई फैक्टर्स रहे हैं, जो भारत की इकॉनमी के सामने चुनौती बनकर खड़े थे. मगर नतीजा एक ही रहा- भारत की फास्टेस्ट ग्रोथ स्पीड.

10 बड़ी चुनौतियां

  • ट्रंप का टैरिफ ऑर्डर, जिसने व्यापार के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक तौर पर भी माहौल को खराब करने का काम किया.
  • भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने से बिजनेस में बाधा आई और एक्सपोर्ट पर दबाव बढ़ा.
  • अमेरिका पर बढ़ते कर्ज की वजह से दुनिया में मंदी की आशंका आज भी बरकरार है.
  • दुनिया में युद्ध की टेंशन, रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर वेस्टर्न एशिया तक युद्ध का माहौल अब भी ठंडा नहीं हुआ है.
  • आंतरिक मोर्चे पर 2025 में पूरे साल शेयर बाजार में सुस्ती रही. निफ्टी और सेंसेक्स का रिटर्न सपाट है.
  • विदेशी निवेशकों यानी FII ने इस साल जमकर भारतीय बाजार से पैसा निकाला.
  • रुपये की कमजोरी ने रिजर्व बैंक के सामने नई चुनौती पेश की.
  • बड़ा राजकोषीय घाटा तो एक परमानेंट चुनौती है ही.
  • इस साल नई नौकरियों का भी बड़ा संकट रहा.
  • AI और ऑटोमेशन ने हजारों नौकरियां छीनने का काम किया.

भारत का दम

इन सभी चुनौतियों के सामने भारत की अर्थव्यस्था मजबूती के साथ डटी रही. किसी भी इकॉनमी की तुलना में सबसे तेज रफ्तार से दौड़ी. खासकर इमर्जिंग इकॉनमी के बीच भी भारत की ग्रोथ रेट साबित करती है कि, बिना शक भारत इस वक्त दुनिया की fastest-growing economy है. वित्तीय साल 2025-26 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून की जीडीपी विकास दर 7.8 फीसदी रही, जो पिछले साल की इसी तिमाही से काफी बेहतर थी. यानी इसमें करीब 1.3 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. वहीं, जुलाई से सितंबर की दूसरी तिमाही में भारत की जीडीपी रेट 8.2 फीसदी रही, जो पिछली छह तिमाहियों में सबसे ज्यादा है. 2024-25 की दूसरी तिमाही में तो आंकड़ा 5.6 फीसदी का था. इस लिहाज से पिछले साल की तुलना में 2.6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इन दोनों को मिला दें तो 2025-26 की पहली छमाही में भारत की अर्थव्यवस्था पहले 6 महीनों में लगभग 8% की दर से बढ़ी.

यह भी पढ़ेंःनया साल, नए नियम: ITR फाइलिंग आसान, बच्चों के सोशल मीडिया नियम होंगे ऑस्ट्रेलिया जैसे सख्त

तेज़ी से बढ़ रहा है भारत

अगर यही रुझान जारी रहे तो 2027 तक भारत जर्मनी को भी पीछे छोड़ तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है. 2030 तक भारत 6-7 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर की अर्थव्यवस्था बन सकता है. IMF की पूर्व चीफ इकनॉमिस्ट गीता गोपीनाथ ने भी कहा कि भारत इस समय अमेरिका-भारत व्यापार संकट के बावजूद बेहतर प्रदर्शन कर रहा है. दिसंबर 2025 मे ही जारी हुई Goldman Sachs की रिपोर्ट कहती है कि ग्लोबल आर्थिक सुस्ती के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है. भारत 2025 में 7.6 फीसदी और 2026 में 6.7 फीसदी की GDP ग्रोथ दर्ज कर सकता है, जो भारत को दुनिया की प्रमुख इकॉनमी के बीच सबसे तेज बढ़ने वाला देश बनाती हैं. दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था के आंकड़ों पर अगर गौर करेंगे तो आपको खुद समझ आ जाएगा कि, भारत ना सिर्फ नंबर वन पर खड़ा है बल्कि, बड़े मार्जिन के साथ दूसरे देशों को पीछे भी छोड़ चुका है. इसके लिए आप 2025 में भारत और दुनिया के तमाम विकासशील और विकसित देशों की अनुमानित ग्रोथ रेट से तुलना पर एक नजर डालिए.

  • भारत 7.6%
  • फिलीपींस 5.5%
  • इंडोनेशिया 5%
  • चीन 4.8%
  • मलेशिया 3.6%
  • अमेरिका 2.8%
  • फ्रांस 1.1%
  • ब्रिटेन 1.3%
  • जर्मनी 0.3%

चीन का हाल

यानी इसी वक्त भारत 7.5 फीसदी के ऊपर खड़ा है और चीन जैसा तरक्की करने वाला देश 4.8 फीसदी पर खड़ा है. अमेरिका तो 3 फीसदी के भी नीचे है और यूरोप की स्थिति और भी खराब है. Goldman Sachs की रिपोर्ट बताती है कि मजबूत निर्यात के बावजूद चीन की घरेलू डिमांड कमजोर बनी हुई है. ये प्रॉपर्टी सेक्टर जीडीपी पर डेढ़ फीसदी का नकारात्मक असर डाल रही है. लेकिन इन्हीं सब इंडिकेटर पर भारत के हालात चीन से बिल्कुल उलट हैं. भारत की इस मजबूती के पीछे सबसे बडी़ वजह मजबूत उसकी घरेलू डिमांड ही है. इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और स्टेबल मैक्रो-इकनॉमिक हालात मुख्य कारण हैं. ये कारण ही भारत को चीन और पश्चिमी देशों से अलग खड़ा करते हैं. लेकिन अब इस हालात के लिए मददगार फैक्टर को समझिए. मतलब वो क्या वजहें रहीं, जिसने भारत की इकॉनमी को दुनिया में सबसे तेजी से दौड़ाया.

  • महंगाई पर नियंत्रण
  • मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की मजबूती
  • कृषि क्षेत्र का शानदार प्रदर्शन
  • मजबूत बैंकिंग सिस्टम, जहां NPA में भारी कमी आई है
  • कई देशों के साथ FTA या फ्री ट्रेड एग्रीमेंट
  • मजबूत घरेलू डिमांड.. जिसका मतलब है शहरों और गांवों में Consumption का बढ़ना, जिससे उद्योग, व्यापार और सर्विस सेक्टर को सपोर्ट मिला.
  • इसके अलावा त्योहारी सीजन में जबरदस्त खरीदारी

सरकार का सपोर्ट

इन सबके पीछे है सरकार का सपोर्ट जिसने एक ऐसा माहौल खड़ा किया, जिससे ना सिर्फ ट्रंप के टैरिफ वाले फैसले का असर कम हो गया, बल्कि लोगों को स्वदेशी चीजें खरीदने की तरफ भी मोड़ा. सरकार ने GST 2.0 को लागू कर भारत की इकॉनमी को बूस्ट देने के लिए एक बड़ा रिफॉर्म करने का फैसला किया. अब डिटेल में समझिए कि एक्सपर्ट भी सरकार के जिन फैसलों की चर्चा कर रहे हैं, उसने क्या बड़ा रोल प्ले किया. निश्चित तौर पर इसमें सबसे ऊपर है. जीएसटी रिफॉर्म, जिसे जीएसटी 2.0 नाम दिया गया. पहले जीएसटी में चार तरह के टैक्स स्लैब थे. 5%,12%, 18%, 28%. लेकिन मोदी सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाया और 12 और 28 फीसदी वाले टैक्स स्लैब को खत्म कर दिया.

यह भी पढ़ेंः किस शहर को कहते हैं भारत का Diamond Capital, यहां तराशे जाते हैं दुनियाभर के हीरे

दीवाली पर मालामाल

इससे पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने बजट के दौरान इनकम टैक्स स्लैब में बड़े बदलाव का एलान किया था, जिसके तहत 12 लाख तक की आमदनी को टैक्स फ्री कर दिया गया. इन दो बड़े फैसलों के जरिए मिडिल क्लास की पॉकेट में मोटी रकम बचने लगी, जिसने डोमेस्टिक कंजप्शन को बडा़ बूस्ट दिया. खासकर त्योहारों के सीजन में लोगों ने बढ़ चढ़कर खरीदारी की और दीवाली में हुई सेल को रिकॉर्ड लेवल पर पहुंचा दिया. दीवाली के दिन रिकॉर्डतोड़ 6.05 लाख करोड़ का कारोबार हुआ. इसमें वस्तुओं की अनुमानित बिक्री 5.40 लाख करोड़ की रही, तो सेवा क्षेत्र में व्यापार 65 हजार करोड़ का रहा. दीवाली के बाद छठ पर्व में भी देशभर में करीब 50 हजार करोड़ रुपये की खरीद-बिक्री हुई. यानी 12 लाख तक टैक्स फ्री आय, GST 2.0, स्वदेशी खरीदने की अपील और कम ब्याज दर के फैसलों ने घरेलू सेक्टर में बडे़ डिमांड को जेनरेट करने का काम किया. कम ब्याज दर के पीछे की वजह है RBI की कंट्रोल्ड मॉनिटरी पॉलिसी, जिसके तहत इस वित्तीय वर्ष में तीसरी बार बार रेपो रेट में कटौती की गई.

मॉनिटरी पॉलिसी

आखिरी रेट कट दिसंबर महीने में ही हुई है. मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी की 3 से 5 दिसंबर तक चली बैठक के बाद रिजर्व बैंक के मैनेजर संजय मल्होत्रा ने इसकी घोषणा की थी, जिसके मुताबिक रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की कमी की गई. दिसंबर से पहले ये 5.5 फीसदी थी, जो अब 5.25 फीसदी पर है. 2025 की बात करें तो इस साल कुल 4 बार रेपो रेट में कटौती का फैसला किया गया है. सबसे पहले फरवरी महीने में 6.5 से 6.25 फीसदी किया गया, जो 5 साल के बाद पहली कटौती थी. फिर 2025 के ही अप्रैल महीने में रेपो रेट को 6.25 से 6 फीसदी कर दिया गया. जून महीने में 6 फीसदी से 5.5 फीसदी किया गया. अंत में दिसंबर महीने में 5.5 फीसदी से 5.25 फीसदी कर दिया गया.

जनता का फायदा

अब ये भी समझ लीजिए कि रेपो रेट कम होने से आम जनता को क्या फायदा होता है.

-इसमें सबसे पहले तो होम लोन की EMI कम हो सकती है..

-होम लोन ही नहीं कार लोन की EMI भी घट सकती है.

-बैंक कम ब्याज दर पर लोन देते हैं, तो ज्यादा लोन लेने की हिम्मत जुटा पाते हैं, जिससे बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ती है.

-फिर देश की GDP ग्रोथ को बल मिलता है.

जरूरी फैक्टर

2025 में भी मजबूत घरेलू डिमांड के पीछे रियल एस्टेट के अलावा इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ता सरकारी खर्च, मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने वाली ‘मेक इन इंडिया’ और PLI प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव जैसी योजनाओं का बड़ा योगदान रहा. इनमें डिजिटल इकॉनमी, स्टार्टअप इकोसिस्टम और फिनटेक सेक्टर ने भी ग्रोथ को रफ्तार देने में मदद की. मतलब भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है, क्योंकि घरेलू मांग और निवेश से समर्थन मिल रहा है और महंगाई भी नियंत्रण में है. ब्याज दर लंबे समय तक कम रहने की संभावना है. आरबीआई के मुताबिक अगर भारत के यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर हो जाते हैं तो देश की आर्थिक तरक्की और रफ्तार से होगी.

शानदार ग्रोथ स्पीड

अब बात उस फैक्टर की, जो भारत की शानदार ग्रोथ स्पीड की कहानी पर एक ग्रहण की तरह है. वो है डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी. 2025 में जीडीपी विकास दर में अगर भारत दुनिया में नंबर वन पर रहा, तो इसी साल भारत की करेंसी यानी रुपया एशिया में सबसे कमजोर करेंसी साबित हुई है. एक आम भारतीय की नजर से देखें तो किसी को भी ये अच्छा नहीं लग सकता कि, हमारी जीडीपी सबसे तेज रफ्तार से दौड़ रही है, लेकिन रुपया ऐतिहासिक तौर पर सबसे कमजोर हो चुका है. वो भी तब जब केंद्र में मोदी की सरकार है. खुद नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले कमजोर रुपये के लिए तत्कालीन मनमोहन सरकार पर बड़ा कटाक्ष किया था. लेकिन केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से भी रुपया लगातार गिरा है. 26 मई 2014 को जब नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभाली थी, तब एक डॉलर की कीमत 58 रुपये 60 पैसे थी. यानी करीब 59 रुपया. पर आज एक डॉलर खरीदने के लिए करीब 90 रुपये देने पड़ रहे हैं. 16 दिसंबर को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरकर रिकॉर्ड 91.16 के निचले स्तर पर आ गया था. हालांकि, वहां से थोड़ा सुधार भी हुआ.

रुपया और डॉलर

2025 में रुपये के मुकाबले डॉलर 6 फीसदी मजबूत हुआ है. 2014 से डॉलर हर साल 4 फीसदी के CAGR से मजबूत हुआ है. यानी इसी रेट से रुपया हर साल कमजोर होता गया. ऐसे में अब समझिए कि शानदार जीडीपी ग्रोथ और कमजोर रुपये का ये Contradictory या विरोधाभासी हालात क्यों हैं, इसके क्या नुकसान है, या इस हालात से क्या इकॉनमी को कोई फायदा भी हो सकता है? दरअसल, रुपया हो या स्टॉक, भाव गिरने का सारा खेल डिमांड और सप्लाई पर टिका होता है. किसी भी चीज की अगर डिमांड ज्यादा होगी, तो भाव बढ़ेगा, सप्लाई ज्यादा होगी तो भाव पर दबाव बनेगा और नीचे गिरेगा. रुपये के साथ भी फिलहाल यही हो रहा है. सप्लाई ज्यादा है और डिमांड कम, जो डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत को नीचे ले जा रहा है. अब इसी कॉन्सेप्ट से रुपये के गिरने के 5 बड़े कारण भी समझते हैं.

यह भी पढ़ेंः चमक ऐसी कि चौंधिया गईं आंखें! 2025 क्यों बना Gold-Silver के लिए लकी, पूरा साल सोने का बाजार

5 बड़ी वजह

-पहला कारण है, भारत के निर्यात में कमी, जो सीधे-सीधे भारतीय रुपये के कम डिमांड से जुड़ा है.

-दूसरा कारण है अमेरिका से टैरिफ डील में देरी. इसे RBI भी बड़ी वजह मान रहा है.

-तीसरा कारण है-अमेरिकी डॉलर में मजबूती. रुपये में गिरावट की ये भी एक बड़ी वजह रही है. क्योंकि रुपया जितना कमजोर हुआ. उससे ज्यादा डॉलर मजबूत हुआ है. अमेरिका शेयर बाजार में रिटर्न भी ज्यादा मिल रहे हैं और निवेशक अपना पैसा इमर्जिंग इकॉनमी से निकालकर अमेरिका में निवेश कर रहे हैं.

-अब इसी से जुड़ा चौथा कारण है FII की सबसे बड़ी बिकवाली. इस साल शेयर मार्केट में FII यानी विदेशी संस्थागत निवेशकों ने सबसे ज्यादा बिकवाली की है. ये आंकड़ा करीब 1.5 लाख करोड़ के बराबर हैं. इसका मतलब ये है कि विदेशी निवेशकों ने 1.5 लाख करोड़ रुपया बाजार में सेल किया. उसके बदले डॉलर खरीद कर विदेश ले गए, जिससे मार्केट में रुपये की सप्लाई बढ़ गई और भाव नीचे चले गए. इस साल रुपये की गिरावट में ये सबसे बडा़ कारण रहा है.

-पांचवां कारण भी अहम है.. RBI रुपये की खरीदारी नहीं कर रहा. अगर मार्केट में रुपये की सप्लाई ज्यादा हो गई है, तो उसे बैलेंस करने के लिए RBI रुपये को खरीद सकता है. RBI पहले भी ये रास्ता अपना चुका है. इस वक्त तो भारत के फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व्स 688 बिलियन डॉलर के आसपास हैं. अगर RBI चाहे तो डॉलर बेचकर रुपये को खरीद सकता है, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है.

इंडिया का एक्सपोर्ट

इसकी एक बड़ी वजह ये भी मानी जा रही है कि ऐसा जानबूझकर किया जा रहा है, ताकि दुनिया में भारत के सामान का आयात बढ़ सके. यानी इंडिया का एक्सपोर्ट बढ़ सके. इसका सीधा मतलब ये है कि अगर रुपया कमजोर होगा, तो भारतीय सामान आयात करने वाले देशों को अपनी कम करेंसी खर्च करके भी ज्यादा सामान मिल सकता है. सामने वाले देशों के लिए ये सौदा आकर्षक हो सकता है. चीन जो आज एक एक्सपोर्ट कंट्री कहलाता है, उसने भी एक वक्त में निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अपनी करेंसी को कमजोर रखा था. भारत की भी वही कोशिश हो सकती है. शायद इन्हीं सब वजहों से RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा भी रुपये के मौजूदा स्तर को बहुत चिंताजनक नहीं मानते हैं. RBI के मुताबिक सरकार की भी इस पर पैनी नजर है. सरकार अपने तरीके से निपटने की तैयारी कर रही है.. हाल के महीनों में रुपये में आई कमजोरी से भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई खास निगेटिव असर नहीं पड़ेगा. RBI का मानना है कि कई सेक्टर बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं, जिससे अर्थव्यवस्था में मजबूती बनी रहेगी.

यह भी पढ़ेंः अब लक्ष्य 2030: जर्मनी को पीछे छोड़ तीसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर भारत अग्रसर

Follow Us On: Facebook | X | LinkedIn | YouTube Instagram

 Follow on WhatsApp

You may also like

LT logo

Feature Posts

Newsletter

@2025 Live Time. All Rights Reserved.

Are you sure want to unlock this post?
Unlock left : 0
Are you sure want to cancel subscription?