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33% हक के लिए महिला आरक्षण बिल ने लड़ा संग्राम, सहे पुरुषों के भद्दे बयान, क्या अब मिलेगा सम्मान?

by Neha Singh
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Women Reservation Bill

Women Reservation Bill Explainer: महिला आरक्षण बिल कानून बन चुका है, लेकिन अभी पूरी तरह से लागू नहीं है. यहां जानें इस बिल ने कितने सालों की लड़ाई के बाद संसद में जीत हासिल की और इसके लागू होने के बाद देश में क्या बदलेगा.

26 March, 2026

संसद समाज का प्रतिनिधित्व करती है, शायद इसीलिए महिलाओं को अपना हक पाने के लिए समाज और संसद दोनों में लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है. हालांकि संसद में इसकी लड़ाई खत्म हो चुकी है, क्योंकि 20 सितंबर 2023 को भारत की संसद में महिला आरक्षण बिल पास हो गया है. लेकिन यह बिल 1996 से ही लटका रहा या यूं कहें कि इसे पुरुषों की बहुमत वाली संसद ने लटका कर रखा. कभी इसे नेताओं के भद्दे बयान सहने पड़े तो कभी कुछ पार्टियों ने इसका पुरर्जोर विरोध किया. सालों के संघर्ष के बाद 2023 में इसे पास कर दिया गया. लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों से पास होकर यह कानून तो बन चुका है. लेकिन इसके लागू होने में अभी इंतजार करना पड़ेगा.

भारत में महिला आरक्षण बिल एक बार फिर चर्चा में आ गया है. संभावना है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले यह लागू किया हो सकता है. इस लेख में आप जानेंगे कि महिला आरक्षण बिल क्या है. यह कब लागू होगा और इस बिल को कब-कब किसके द्वारा विरोध का सामना करना पड़ा है.

महिला आरक्षण बिल क्या है?

महिला आरक्षण बिल, जिसे ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के नाम से जाना जाता है, भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के मकसद से एक अहम कानून है. यह ऐतिहासिक कानून महिलाओं के लिए भारतीय संसद और राज्य की विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें यानी 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करता है. इसके अलावा, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए रिज़र्व सीटों पर महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाएंगी, जिससे सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों की महिलाओं के लिए प्रतिनिधित्व पक्का होगा. संसद में महिलाओं के लिए समान मौकों की मांग लंबे समय से की जा रही है, लेकिन इसमें कई रुकावटें आईं.

यह कब लागू होगा?

महिला आरक्षण बिल के पास होने के बावजूद, यह अभी लागू नहीं हुआ है. इसे लागू करने के लिए दो प्रक्रियाओं का पूरा होना जरूरी हैं: पहला, देश में नई जनगणना कराना, और दूसरा है परिसीमन, यानी चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से बनाना. परिसीमन के बाद ही यह तय हो पाएगा कि महिलाओं के लिए कौन सी सीटें आरक्षित होंगी. इसके अलावा, आरक्षित सीटों को भी बदला जाएगा. यानी हर चुनाव में अलग-अलग इलाकों की सीटें आरक्षित होंगी, ताकि किसी एक इलाके में परमानेंट रिजर्वेशन न रहे. परिसीमन के लिए पहले जनगणना कराना जरूरी है. 2011 की जनगणना के बाद से अभी तक नई जनगणना नहीं हुई है, इसलिए इस कानून को लागू होने में समय लग सकता है. एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि अगर जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया समय पर पूरी हो जाती है, तो यह कानून 2029 के लोकसभा चुनावों तक लागू हो सकता है.

1996 से जंग लड़ रहा महिला आरक्षण बिल

महिलाओं के हक के लिए लड़ता यह बिल सबसे पहले साल 1996 में एचडी देवगौड़ा की सरकार ने संसद में पेश किया था. लेकिन पुरुषों से भरी संसद को लगा कि इससे उनका वोट बैंक और सत्ता सरंचना खराब हो जाएगी. खुद को पिछडों और दलितों की आवाज बताने वाले लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव भी इसके विरोध में थे, जिससे देवगौड़ा की सरकार अल्पमत में आ गई थी. इस तरह 1996 में महिला आरक्षण बिल आग नहीं बढ़ सका. साल 1997 में एक बार फिर इसे पास करने का प्रयास किया गया. लंबी बहस के बाद इसे फिर से स्थगित करना पड़ा. उस समय जेडीयू नेता शरद यादव ने कहा था, ‘परकटी महिलाएं हमारी महिलाओं के बारे में क्या सोचेंगी समझेंगी’

इसके बाद, 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA सरकार सत्ता में आई, और महिला आरक्षण बिल को पास करवाने के लिए कई प्रयास किए गए. इसी तरह साल 1998 में अटल बिहारी सरकार ने इसे संसद में पेश करने की कोशिश की और असफल रहे. 1999 में बिल पास नहीं हो सका. साल 2003 में वाजपेयी की सरकार ने फिर बिल को पेश किया, लेकिन प्रश्नकाल में इतना हंगामा हुआ कि इसे फिर से स्थगित करना पड़ा. इसके बाद सत्ता बदली लेकिन बिल आगे नहीं बढ़ा. वाजपेयी सरकार ने 2003 में फिर से महिला आरक्षण बिल लाने की कोशिश की. लेकिन, प्रश्नकाल के दौरान भारी हंगामा हुआ, जिससे यह पास नहीं हो सका.

सरकार गिरने के डर से रुक गया बिल

2004 में, NDA सरकार का कार्यकाल समाप्त होने के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार सत्ता में आई और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने. इस सरकार ने महिला आरक्षण बिल को आगे बढ़ाने की कोशिश की. 2010 में, इसे राज्यसभा में 108वें संवैधानिक संशोधन बिल के तौर पर पेश किया गया. आखिरकार, 9 मार्च 2010 को, यह बिल राज्यसभा में भारी बहुमत से पास हो गया. जहां भारतीय जनता पार्टी, वामपंथी पार्टियों और JD(U) ने इस बिल का समर्थन किया, वहीं समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने इसका विरोध किया. विरोध इतना जोरदार था कि उस दिन संसद में व्यवस्था बनाए रखने के लिए मार्शलों को बुलाना पड़ा. हालांकि, राज्यसभा से पास होने के बावजूद, UPA सरकार ने इस बिल को लोकसभा में पेश नहीं किया. उन्हें डर था कि ऐसा करने से उनकी सरकार गिर सकती है, क्योंकि बिल का विरोध करने वाली पार्टियाँ खुद ही सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा थीं.

2019 में सरकार ने दिया ध्यान

इसके बाद, यह बिल लंबे समय तक लटका रहा. 2014 में भारतीय राजनीति की तस्वीर बदली और बीजेपी सत्ता में आई. अपने पहले कार्यकाल में बीजेपी सरकार ने इस बिल पर ध्यान नहीं दिया. साल 2019 में एक बार फिर महिला आरक्षण का मुद्दा गरमाया. भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही. राहुल गांधी ने भी कहा था कि अगर उनकी सरकार सत्ता में आई, तो वे महिला आरक्षण को लागू कर देंगे.

तीन दशकों बाद कानून बना महिला आरक्षण बिल

लगभग तीन दशकों की बहस के बाद आखिरकार साल 2023 में मोदी सरकार ने इसे लोकसभा और राज्यसभा में पास किया. इस बिल को विपक्ष का भी पूरा समर्थन मिला. 19 सितंबर, 2023 को इस बिल को 128वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश किया था. यह बिल नई संसद में पास होने वाल पहला बिल बना, जिसे लगभग आठ घंटों की लंबी बहस के बाद लोकसभा में पास किया था. लोकसभा में इसके पक्ष में 454 वोट आए और केवल AIMIM के दो सांसदों ने इसका विरोध किया. वहीं राज्यसभा में बिल के पक्ष में 215 में 214 वोट मिले. उस राज्यसभा में उपस्थित सभी सांसदों ने इसका समर्थन किया. प्रचंड बहुमत पाने वाला यह पहला बिल बना. इसके बाद 28 सितंबर, 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बिल पर हस्ताक्षर किए, जिससे यह आधिकारिक तौर पर कानून बन गया.

कैसे बदलाव करेंगी महिलाएं

सबसे बड़ा बदलाव लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटों का आरक्षण होगा. इससे संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या मौजूदा संख्या के मुकाबले काफी बढ़ जाएगी. अभी, महिलाओं का प्रतिनिधितत्व सीमित है, लेकिन यह कानून उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी को बढाएगा. जैसे-जैसे ज्यादा महिलाएं फैसले लेने में शामिल होंगी, वैसे-वैसे सरकारी नीतियों के बनने और लागू होने की प्रक्रिया में भी तेजी आएगी. एजुकेशन, हेल्थ, न्यूट्रिशन, महिलाओं की सेफ्टी और जेंडर इक्वालिटी जैसे मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा. कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि स्थानीय राजनीति में (जैसे पंचायत) महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से सुधार हुआ है. तीसरा असर सामाजिक स्तर पर होगा. आज भी महिलाओं के लिए यह सोचा जाता है कि उन्हें राजनीति की समझ नहीं होती और वे घर-गृहस्थी संभालने के ही योग्य हैं. महिलाओं की बढ़ी हुई राजनीतिक हिस्सेदारी से समाज में उनकी भूमिका और मजबूत होगा. इससे युवा लड़कियों को भी मोटिवेशन मिलेगा.

आज राजनीति में कितने प्रतिशत की भागीदार हैं महिलाएं

सदनकुल सीटेंमहिला सांसदप्रतिशत (%)
लोकसभा5437814.4%
राज्यसभा2383113.0%
राज्य / समूहमहिला विधायकों का प्रतिशत (%)
छत्तीसगढ़14%
पश्चिम बंगाल13.7%
झारखंड12.4%
बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली10–12%
आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, ओडिशा, सिक्किम, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा10% से कम

वर्तमान में यह भागीदारी बहुत कम है, लेकिन परीसीमन के बाद लोकसभा राज्यसभा और विधानसभाओं की सीटें बढ़ेंगीं और उसमें से 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी.

समय के साथ होगा बदलाव

आरक्षण लागू हो जाने के बाद भी महिलाओं के सामने कुछ चुनौतियां बनी रहेंगी. शुरुआत में, प्रॉक्सी रिप्रेजेंटेशन (जहां पुरुष महिला रिप्रेजेंटेटिव की पीठ पीछे फैसले लेते हैं) की समस्या आ सकती है. आरक्षित सीटों पर पुरुष उम्मीदवार अपनी पत्नी, बेटी या बहू को टिकट दिलवाकर खुद सत्ता संभाल सकते हैं, जिससे बचने के लिए महिलाओं के अपने स्टैंड लेने की क्षमता विकसित करने की जरूरत है. इसके अलावा, यह रिजर्वेशन जनगणना और परिसीमने के बाद ही पूरी तरह से लागू होगा, इसलिए इसका असर तुरंत नहीं, बल्कि समय के साथ महसूस होगा. आखिरकार, यह बिल सिर्फ सीट रिजर्वेशन के बारे में नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को ज्यादा समावेशी बनाने और लैंगिक असमानता खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम है.

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