Home Latest News & Updates कुर्सी की जंग, जातियों का रंग: गैर यादव ओबीसी और दलितों के सहारे UP में फिर कमल खिलाने की तैयारी!

कुर्सी की जंग, जातियों का रंग: गैर यादव ओबीसी और दलितों के सहारे UP में फिर कमल खिलाने की तैयारी!

by Sanjay Kumar Srivastava 10 May 2026, 6:22 PM IST (Updated 11 May 2026, 3:41 PM IST)
10 May 2026, 6:22 PM IST (Updated 11 May 2026, 3:41 PM IST)
कुर्सी की जंग, जातियों का रंग: गैर-यादव ओबीसी और दलितों के सहारे यूपी में फिर कमल खिलाने की तैयारी!

Introduction 

UP 2027: गैर-यादव ओबीसी और दलितों पर दांव सपा प्रमुख अखिलेश यादव के ‘पीडीए’ कार्ड का मुकाबला करने के लिए भाजपा ने इस विस्तार में गैर यादव ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) और अनुसूचित जाति (एससी) पर अपना सबसे बड़ा दांव खेला है.

Table Of content

  • जातिगत समीकरणों को संतुलित करना
  • ओबीसी ध्रुवीकरण
  • दलितों की हिस्सेदारी
  • ब्राह्मण मतदाताओं को लुभाया
  • पश्चिमी UP में जाट, किसान और मुस्लिमों का बोलबाला
  • जाट-गुर्ज़र गठजोड़
  • गैर-जाटव दलितों पर फोकस
  • चार हिस्सों में यूपी की राजनीति
  • सपा को हराने के लिए जातियों को साधना जरूरी
  • कृष्णा पासवान का भी असर
  • सुरेंद्र दिलेर का जाटव समुदाय में दबदबा

UP 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए 60 मंत्रियों की टीम के साथ चुनावी चक्रव्यूह तैयार किया है. यह विस्तार गैर-यादव ओबीसी, दलित और महिला चेहरों को प्राथमिकता देकर क्षेत्रीय संतुलन साधने और विपक्ष के समीकरणों को मात देने की रणनीति का हिस्सा है. 10 मई को जन भवन लखनऊ में आयोजित एक विशेष समारोह में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने नए चेहरों और पदोन्नत मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई.

बीजेपी के इस कदम का मकसद समाजवादी पार्टी (एसपी) के ‘पीडीए’ (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण को खत्म करना और गैर यादव ओबीसी, अनुसूचित जाति (एससी) और महिला प्रतिनिधित्व को मजबूत करना है. उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिहाज से यह फेरबदल रणनीतिक तौर पर काफी अहम माना जा रहा है. राज्य सरकार में मुख्यमंत्री और दो उपमुख्यमंत्री समेत कुल 60 मंत्री शामिल हैं. संवैधानिक प्रावधानों के तहत उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में अधिकतम 60 सदस्यों की सीमा है. इन 60 मंत्रियों को बहुत कम समय में सरकारी योजनाओं को जमीन पर उतारने की ‘डेडलाइन’ दी जाएगी.

ये भी पढ़ेंः एक बार फिर से हिमंता के हाथों होगी असम की कमान, चुने गए एनडीए विधायक दल के नेता

मंत्रियों के कामकाज की सीधी रिपोर्ट संगठन को जाएगी, जिसके आधार पर ही 2027 में उनके खुद के टिकट का फैसला होगा यानी मंत्रियों के कंधों पर खुद को साबित करने के साथ पार्टी को जिताने का दोहरा दबाव होगा. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रिक्त पदों को भरकर मंत्रिमंडल में कुल पदों की संख्या 60 कर दी है ताकि चुनावी समीकरणों को अधिकतम धार दी जा सके. इस विस्तार की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए पुराने मंत्रियों को हटाए बिना 6 नए मंत्रियों को शामिल किया गया और 2 मौजूदा राज्य मंत्रियों को पदोन्नत कर ‘स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री’ का दर्जा दिया गया.

जातिगत समीकरणों को संतुलित करना

गैर-यादव ओबीसी और दलितों पर दांव सपा प्रमुख अखिलेश यादव के ‘पीडीए’ कार्ड का मुकाबला करने के लिए भाजपा ने इस विस्तार में गैर यादव ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) और अनुसूचित जाति (एससी) पर अपना सबसे बड़ा दांव खेला है.

ओबीसी ध्रुवीकरण

वाराणसी से आने वाले हंसराज विश्वकर्मा को शामिल कर पूर्वांचल के विश्वकर्मा, बढ़ई और लोहार समाज को सीधा संदेश दिया गया है. हंसराज विश्वकर्मा के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और आसपास के जिलों को कवर किया गया है. वहीं, लोध समुदाय के बड़े चेहरे कैलाश राजपूत को लाने से कन्नौज और फर्रुखाबाद बेल्ट में पार्टी की स्थिति मजबूत हुई है.

ये भी पढ़ेंः केरल CM की दौड़ में सतीसन, वेणुगोपाल और चेन्निथला सबसे आगे, आलाकमान का निर्णय सर्वोपरि

दलितों की हिस्सेदारी

खैर (अलीगढ़) से विधायक सुरेंद्र दिलेर (वाल्मीकि समाज) को मंत्री बनाकर हाथरस और अलीगढ़ बेल्ट के महादलित वोटों को जोड़ने की कोशिश की गई है. खागा (फतेहपुर) से विधायक कृष्णा पासवान के शामिल होने से पासी समुदाय के बीच पैठ मजबूत हुई है. पश्चिमी यूपी में जाट नेता भूपेन्द्र चौधरी, गुर्जर नेता सोमेन्द्र तोमर और सुरेंद्र दिलेर के जरिए इस किसान बहुल इलाके में राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के साथ जमीनी स्तर पर गठबंधन को मजबूत करने और अंदरूनी नाराजगी को दूर करने की कोशिश की गई है.

ब्राह्मण मतदाताओं को लुभाया

सपा से बगावत करने वाले ऊंचाहार विधायक मनोज पांडे को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देना रायबरेली और अमेठी मंडल के ब्राह्मण मतदाताओं को आकर्षित करने की एक बड़ी रणनीति है.

विपक्ष के समीकरणों को मात देने की रणनीति

लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने सीधे तौर पर उस सामाजिक ताने-बाने पर हमला बोला है जिसके सहारे विपक्ष 2027 में सत्ता में वापसी का सपना देख रहा था. सपा के गढ़ रहे कन्नौज और रायबरेली से जुड़े चेहरों को सरकार में बड़ी तरजीह देकर बीजेपी ने साफ कर दिया है कि वह विपक्ष के पारंपरिक किले में सेंध लगाने के लिए पूरी तरह तैयार है. महिला चेहरे के रूप में कृष्णा पासवान की एंट्री ने ‘आधी आबादी’ के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व के साथ सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और महिला सुरक्षा एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम किया है.

पश्चिमी UP में जाट, किसान और मुस्लिमों का बोलबाला

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, बरेली, मेरठ, मुरादाबाद, आगरा और अलीगढ़ संभाग की राजनीति में मुख्य रूप से जाट, धार्मिक ध्रुवीकरण और किसान खासा प्रभाव डालते हैं. पूरे पश्चिमी यूपी में औसत मुस्लिम आबादी लगभग 26% है. लेकिन सहारनपुर, मुरादाबाद, बिजनौर और रामपुर जैसे जिलों में यह 40% या उससे अधिक हो जाती है.जबकि जाट (करीब 15%) इस क्षेत्र की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक और आर्थिक जाति है. इनका प्रभाव करीब 50 से अधिक सीटों पर सीधा है. इसके अलावा नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद और मेरठ बेल्ट में गुर्ज़र (7%) समुदाय बेहद मजबूत है. इसमें सबसे बड़ी आबादी जाटव समाज (18% से 20%) की है (जो मायावती का पारंपरिक कोर वोटर रहा है). इसके अलावा वाल्मीकि और खटीक समाज की भी अच्छी उपस्थिति है. उच्च जातियां (15%) में ब्राह्मण, राजपूत (ठाकुर) और त्यागी समाज का इस बेल्ट में मजबूत आर्थिक और सामाजिक दबदबा है.

जाट-गुर्जर गठजोड़

रालोद (RLD) के साथ गठबंधन को मजबूती देने के लिए भूपेंद्र चौधरी (जाट) को कैबिनेट में बड़ी जिम्मेदारी और सोमेंद्र तोमर (गुर्ज़र) को प्रमोट किया गया है.

गैर-जाटव दलितों पर फोकस

अलीगढ़ से सुरेंद्र दिलेर (वाल्मीकि समाज) को मंत्री बनाकर गैर जाटव दलित वोटों को भाजपा पाले में बनाए रखने का चक्रव्यूह है. पूर्वांचल यानी गोरखपुर, वाराणसी, प्रयागराज, आजमगढ़, बस्ती, और मिर्जापुर संभाग की राजनीति बहुजातीय है. यहां कोई एक जाति पश्चिमी यूपी की तरह पूरे क्षेत्र पर हावी नहीं है. यादव (12%) सपा का कोर वोटर है, जो आजमगढ़, जौनपुर, गाजीपुर और मऊ में निर्णायक भूमिका में है. कुर्मी (10%) मिर्जापुर, प्रयागराज और वाराणसी बेल्ट में बेहद मजबूत हैं. अति पिछड़ों (20% से 25%) में मौर्य/कुशवाहा, राजभर, निषाद/बिंद और चौहान जैसी छोटी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण उपजातियां शामिल हैं. उच्च जातियों (सवर्ण 18% से 20%) में ब्राह्मण (10%) का पूर्वांचल की राजनीति में खासा दबदबा रहा है. जैसे गोरखपुर और महाराजगंज बेल्ट में ब्राह्मण निर्णायक रहता है.

ये भी पढ़ेंः मुख्यमंत्री बनते ही एक्शन में दिखे विजय, महिला सुरक्षा समेत लिए ये तीन बड़े फैसले

राजपूत/क्षत्रिय (7% से 8%) सीएम योगी आदित्यनाथ का गृह क्षेत्र होने के कारण यह वर्ग राजनीतिक रूप से बेहद मुखर है. जबकि गाजीपुर, मऊ और बलिया में भूमिहार (2%) प्रभावशाली हैं. पूर्वांचल में जाटव के अलावा पासी, धोबी, गोंड और कोल समाज की बड़ी आबादी है. योगी कैबिनेट विस्तार में अति पिछड़ों को तवज्जो दी गई है. वाराणसी के हंसराज विश्वकर्मा को मंत्री बनाकर बढ़ई/लोहार समाज को जोड़ा गया है. वहीं अजीत पाल को प्रमोट करके गडरिया/पाल समाज को साधा गया है. सपा छोड़कर आए मनोज पांडेय (रायबरेली/अवध बॉर्डर) को कैबिनेट मंत्री बनाकर विपक्ष के ब्राह्मण कार्ड को फेल करने की कोशिश है.फतेहपुर/प्रयागराज बेल्ट से महिला चेहरा कृष्णा पासवान को शामिल कर सपा-कांग्रेस के पासी झुकाव को रोकने की रणनीति है.

चार हिस्सों में यूपी की राजनीति

यूपी की सियासत में राज्य को चार हिस्सों में देखा जाता है. इनमें पूर्वाचल, पश्चिमांचल, अवध और बुन्देलखण्ड शामिल हैं. इनमें पूर्वांचल का प्रभाव ज्यादा है क्योंकि पीएम मोदी वाराणसी से सांसद हैं. इसके अलावा सीएम योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से आते हैं. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी भी गोरखपुर के रहने वाले हैं और बगल की महराजगंज सीट से सांसद हैं. इसके अलावा कई चर्चित मंत्री भी पूर्वाचल से आते हैं.

SP को हराने के लिए जातियों को साधना जरूरी

बीजेपी जानती है कि समाजवादी पार्टी पीडीए के रथ पर सवार होकर उससे मुकाबला करेगी. ऐसे में जातियों को साधना बीजेपी की रणनीति का अहम हिस्सा है. ओबीसी के अलावा अनुसूचित जाति का विकास बीजेपी की प्राथमिकता है. लोकसभा चुनाव में दलित वोटों के बिखराव से नुकसान झेल चुकी बीजेपी विस्तार के जरिए एससी समुदाय को यह संदेश देने की पूरी कोशिश करेगी कि बीजेपी में भागीदारी के मामले में एससी समुदाय को कम तरजीह नहीं दी जाती है. जातीय और क्षेत्रीय संतुलन की बात करें तो अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी अनुसूचित जाति और ओबीसी को खास तवज्जो देती दिख रही है. इसके अलावा हाल ही में ब्राह्मणों की नाराजगी को देखते हुए एक ब्राह्मण नेता को मंत्रिमंडल में जगह दी गई है. पासी समुदाय और अनुसूचित जाति को खुश करने की राजनीति के तहत बीजेपी एससी वर्ग के नेताओं को जगह देने के पक्ष में खड़ी दिख रही है.

ये बनें मंत्री

इस मौके पर भूपेन्द्र चौधरी, मनोज पांडे, अजीत सिंह पाल, सोमेंद्र तोमर, कृष्णा पासवान, कैलाश राजपूत, सुरेंद्र दिलेर और हंसराज विश्वकर्मा ने मंत्री पद की शपथ ली.

सुरेंद्र दिलेर का जाटव समुदाय में दबदबा

अलीगढ़ जिले की खैर विधानसभा सीट से विधायक सुरेंद्र दिलेर ने राज्य मंत्री पद की शपथ ली. वह मूल रूप से जाटव समुदाय से आते हैं. वह राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से आने वाले दलित नेता भी हैं. उनके दादा किशन लाल दिलेर हाथरस लोकसभा सीट से चार बार सांसद और छह बार विधायक रहे थे. उनके पिता स्व. रविर सिंह दिलेर हाथरस सीट से बीजेपी सांसद थे. एक बार विधायक भी रहे. पश्चिमी यूपी में दलित राजनीति के लिहाज से उनका नाम काफी प्रभावशाली माना जाता है. बीजेपी लंबे समय से उन्हें संगठन और क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका दे रही है.

ये भी पढ़ेंः CM Vijay: तमिलनाडु में ‘थलापति राज’, चंद्रशेखरन जोसेफ विजय ने ली मुख्यमंत्री पद की शपथ

कृष्णा पासवान का भी असर

सेंट्रल यूपी में महिलाओं के साथ-साथ दलित वोट बैंक को साधने के लिए फतेहपुर की खागा सीट से विधायक कृष्णा पासवान को मंत्री बनाया गया है. कृष्णा पासवान को दलित समाज, खासकर पासवान समुदाय में एक प्रभावशाली नेता माना जाता है. बीजेपी ने पूर्वांचल और सेंट्रल यूपी में पासवान वोट बैंक को साधने के लिए उन्हें मंत्री बनाया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना ​​है कि बीजेपी 2027 से पहले हर उस सामाजिक समूह को प्रतिनिधित्व देना चाहती है, जहां विपक्ष अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है यानी बीजेपी दलित समुदाय के साथ-साथ महिला कार्ड पर भी अपना दांव खेल रही है.सेंट्रल यूपी और बुन्देलखंड से सटे इलाकों में कई सीटों पर पासवान समुदाय का प्रभाव निर्णायक माना जाता है. पिछले कुछ सालों से बीजेपी गैर-जाटव दलितों और गैर-यादव पिछड़े वर्गों को मजबूती से अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है. कृष्णा पासवान की ताजपोशी को सिर्फ मंत्री पद ही नहीं बल्कि दलित सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने की रणनीतिक पहल भी माना जा रहा है. सपा के ‘पीडीए’ और बीजेपी के इस ‘कैबिनेट इन्फ्रास्ट्रक्चर’ में से किसका दांव 2027 में यूपी की गद्दी पर दोबारा कब्जा दिलाएगा? यह देखना दिलचस्प होगा.

Conclusion

योगी सरकार 2.0 का यह बहुप्रतीक्षित दूसरा मंत्रिमंडल विस्तार पूरी तरह से मिशन 2027 को समर्पित है. 60 मंत्रियों की यह जंबो टीम अब विकास कार्यों की गति बढ़ाने के साथ-साथ जमीनी स्तर पर जातीय और क्षेत्रीय असंतोष को खत्म करने के लिए काम करेगी. गैर यादव ओबीसी, दलित, ब्राह्मण और महिला कार्ड के जरिए बीजेपी ने विपक्ष के चक्रव्यूह को भेदने के लिए अपने मोहरे तैनात कर दिए हैं.

ये भी पढ़ेंः असम में राज्यपाल से मिले एनडीए नेता: नड्डा और सैनी की मौजूदगी में पेश किया सरकार बनाने का दावा

Follow Us On: Facebook | X | LinkedIn | YouTube Instagram

You may also like

LT logo

Feature Posts

Newsletter

@2026 Live Time. All Rights Reserved.

Are you sure want to unlock this post?
Unlock left : 0
Are you sure want to cancel subscription?