Somnath Temple: भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिगों में से एक सोमनाथ प्रथम स्थान पर आते हैं. गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में प्रभास पाटन (समुद्र तट) के तट पर ऐतिहासिक और भव्य सोमनाथ मंदिर स्थित है. आज सोमवार को सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के खास अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मंदिर में पूजा अर्चना करने पहुंचे. इस दौरान उन्होंने भगवान सोमनाथ का जलाभिषेक भी किया. पीएम मोदी ने यहां की कुछ खास तस्वीरों को एक्स पर शेयर करते हुए लिखा, “सोमनाथ की भव्य और दिव्य पावन धरा पर महादेव के चरणों में महापूजा और कुंभाभिषेक का परम सौभाग्य प्राप्त करना जीवन के अत्यंत भावपूर्ण और अविस्मरणीय क्षणों में से एक है. ईश्वर रूपी जनता जनार्दन का स्मरण करते हुए महादेव के दर्शन और पूजन का यह अलौकिक अवसर, हृदय को अनंत आध्यात्मिक ऊर्जा, श्रद्धा और शिवमय चेतना से अभिभूत कर गया है.”
वहीं, भारत सरकार के द्वारा देश में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाया जा रहा है. पूरे वर्ष भर चलने वाला यह पर्व अटूट आस्था की गौरव गाथा है. यह इतिहास की दो घटनाओं को याद दिलाता है. यह पर्व सोमनाथ मंदिर पर पहले आक्रमण (जनवरी 1026 ईस्वी) के 1000 वर्ष पूरे होने और देश की आजादी के बाद भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के द्वारा मंदिर को फिर से निर्माण (1951 में) करने का स्मरण कराता है. इस मंदिर को आक्रांता महमूद गजनवी ने एक-दो बार नहीं बल्कि 17 बार आक्रमण कर लूटने और मिटाने की नाकाम कोशिश की थी. इतिहास गवाह है कि इस साल सोमनाथ मंदिर पर पहले हमले का 1000 वर्ष पूरा हो गया है, गजनवी ने इसे 17 बार लूटा लेकिन उसके द्वारा मिटाए नहीं मिटा इस ‘सोमनाथ’ मंदिर का अस्तित्व. आइए सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के इस साल में हम आपको सोमनाथ मंदिर के इतिहास और भारतीय संस्कृति व आस्था के ना मिटने वाले इस पवित्र स्थल के बारे में बताते हैं.
Table of Content
- सोमनाथ पर हमले का 1000 साल
- 15 दिनों तक सोमनाथ में रहा था गजनवी
- 59 साल की उम्र में हुई थी गजनवी की मौत
- सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण
- आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण
- 11 मई 1951 को सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन
- 11 मई 2026 को सोमनाथ मंदिर पहुंचे पीएम मोदी
- अरब सागर के तट पर भव्यता के साथ है सोमनाथ मंदिर
सोमनाथ पर हमले का 1000 साल
बीते 6 जनवरी को आस्था का पवित्र स्थल माने जाने वाले सोमनाथ मंदिर पर हमले का 1000 साल पूरा हुआ. इतिहास के पन्नों को जब हम पलटते हैं तो मालूम होता है कि मुगल आक्रांता महमूद गजनवी ने 6 जनवरी 1026 ईस्वी को सोमनाथ मंदिर पर अपना पहला हमला किया था. उसके साथ 30 हजार सैनिकों की बड़ी फौज थी, जो हथियारों से लैस थी. सोमनाथ में तीन दिनों तक चले भीषण युद्ध के बाद गजनवी की सेना किले में प्रवेश कर गई. इस दौरान उसने सोमनाथ मंदिर की रक्षा में लगे निहत्थे भक्तों और लोगों पर हमला कर दिया एवं मार-काट मचा दिया. इसमें 50 हजार से अधिक निहत्थे शिव भक्तों व लोगों की जान चली गई थी. नरसंहार करने के दौरान आक्रांता गजनवी ने मंदिर और किला परिसर में खूब लूट-पाट की. वह करीब 6 टन सोना, चांदी, रत्न और आभूषणों के साथ करोड़ों की संपत्ति को लूट ले गया. इतिहास बताता है कि गजनवी के इस हमले के बाद मंदिर को भी नुकसान पहुंचा था, जिसे बाद में राजा भीमदेव और परमार राजा भोज ने बनवाया था.
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15 दिनों तक सोमनाथ में रहा था गजनवी
इतिहास बताता है कि गजनी का शासक महमूद गजनवी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया था और सोमनाथ मंदिर को 17 बार लूटा था. कई किताबों और इतिहास के पन्नों में दर्ज की गई इस घटना की बातें यह दर्शाती हैं कि गजनवी ने सोमनाथ के साथ सोमनाथ मंदिर को काफी तबाह किया था. बताया जाता है कि महमूद ने अपने सैनिकों के साथ सोमनाथ शहर पर पहले तीरों से हमला किया. उसके बाद उसके सैनिक शहर की दीवार (परकोटा) पर रस्सियों की सीढ़ियों से चढ़ गए और सोमनाथ में अत्याचार करने लगे. उन्होंने वहां मार-काट मचा दी. शहर में तबाही के बाद वे सोमनाथ मंदिर में गए, जो 56 खंभों पर बना हुआ था. वे मंदिर में तोड़फोड़ किए.
इतिहास की किताबें बताती हैं कि सोमनाथ में गजनवी ने खूब लूटपाट की थी. उसने मंदिर की कई मूर्तियों को खंडित कर दिया था. इनमें से कई मूर्तियों को गजनी पहुंचवा दिया था. वह सोमनाथ में करीब 15 दिनों तक रहा था और सोना, चांदी, हीरा-मोती, सहित कई मूर्तियों को लूटकर अपने गजनी में ले गया था.

59 साल की उम्र में हुई थी गजनवी की मौत
कई इतिहासकार बताते हैं कि अपने जीवन के आखिरी दिनों में महमूद गजनवी काफी बीमार रहा था. वह करीब दो वर्षों तक गंभीर बीमार और परेशान रहा. कई जानकार बताते हैं कि उसे हॉर्ट की बीमारी थी. करीब 33 वर्ष शासन करने और गंभीर बीमारी से जूझने के बाद महमूद गजनवी की 59 साल की उम्र में मौत हो गई थी.
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सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण
महमूद के मरने के बाद भारत में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की तैयारी शुरू हुई. इसका काम चालुक्य वंश के राजा भीम प्रथम ने अपनी देखरेख में शुरू करवाया. इतिहास बताता है कि सोमनाथ मंदिर को कई बार तोड़ा और उसके बाद फिर कई बार बनवाया गया. 12वीं सदी में सोलंकी वंश के राजा कुमारपाल ने भी सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था. उनके बाद 18वीं सदी में मध्य प्रदेश के इंदौर की महरानी अहिल्याबाई ने भी सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण अपनी देखरेख में करवाया.

आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण
भारत सरकार के आधिकारिक तथ्यों के अनुसार, आजादी के बाद एक बार फिर से सोमनाथ मंदिर का शानदार पुनर्निर्माण कराया गया. स्वतंत्रता के बाद सन् 1947 में, देश के उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के खंडहरों का दौरा किया और मंदिर के पुनर्निर्माण का अपना दृढ़ संकल्प व्यक्त किया. उन्होंने केएम मुंशी की देखरेख में मंदिर को भव्य और दिव्य बनाने की कोशिश की. कहा जाता है कि सरदार पटेल का दृष्टिकोण इस विश्वास पर आधारित था कि सोमनाथ का पुनरुद्धार भारत के सांस्कृतिक विश्वास को बहाल करने के लिए जरूरी है. यह पुनर्निर्माण जन-भागीदारी और राष्ट्रीय संकल्प के साथ शुरू किया गया था.
दुखद बात यह रही कि मंदिर के निर्माण कार्य पूरे होने से पहले सरदार पटेल का 15 दिसंबर 1950 को निधन हो गया. उनके निधन के बाद मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने संभाली. मंदिर निर्माण पूरा होने के बाद इसका उद्घाटन का समय आया.
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11 मई 1951 को सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन
11 मई 1951 में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ, राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में भाग लिया. इस दिन कैलाश महामेरु प्रसाद स्थापत्य शैली में निर्मित वर्तमान मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की गई. यह समारोह केवल एक मंदिर के पुनः खुलने का ही प्रतीक नहीं था, बल्कि भारत के सभ्यतागत आत्म-सम्मान की पुष्टि थी.
यहां एक बात यह भी सामने आई थी कि राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के द्वारा इस समारोह में शामिल होने का तब के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने विरोध किया था. उन्होंने कहा था कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के शासनाध्यक्ष को धार्मिक पुनरुत्थानवाद के साथ खुद को नहीं जोड़ना चाहिए. उन्होंने 2 मई 1951 को मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखकर यहां तक कह डाला था, “आपने समाचारपत्रों में सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के बारे में खबरें पढ़ी होंगी. हमें साफ समझ लेना चाहिए कि ये एक सरकारी समारोह नहीं है और भारत सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है.”

11 मई 2026 को सोमनाथ मंदिर पहुंचे पीएम मोदी
आज 11 मई 2026 को सोमनाथ मंदिर के उस ऐतिहासिक दिन का 75 साल पूरा हो गया है, जब आजादी के बाद पहली बार 11 मई 1951 को सोमनाथ मंदिर को भक्तों के लिए फिर से खोला गया था. आज इस खास मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमनाथ मंदिर पहुंचे. यहां उन्होंने सोमनाथ मंदिर में भगवान शिव की पूजा-अर्चना की और जनसभा को संबोधित किया. इस खास मौके पर पीएम मोदी ने कहा, “आज प्रभास पाटन का पवित्र क्षेत्र एक अद्भुत प्रभा से भरा है. महादेव का ये साक्षात्कार, सौंदर्य, धरती और आसमान से हुई पुष्प वर्षा, भगवा ध्वजों की आभा, कला संगीत और नृत्य की अद्भुत प्रस्तुतियां, वेद मंत्रों का उच्चार, गर्भ गृह में हो रहा शिव पंचाक्षरी का अखंड पाठ और इस सबके साथ सागर की लहरों का जय घोष ऐसा लग रहा है जैसे ये सृष्टी एक साथ बोल रही है जय सोमनाथ.”
उन्होंने आगे कहा, “दादा सोमनाथ के अनन्य भक्त के रूप में मैं कितनी बार यहां आया हूं, कितनी ही बार उनके सामने नतमस्तक हुआ हूं, लेकिन आज जब मैं यहां आ रहा था, तो समय की ये यात्रा एक सुखद अनुभूति दे रही थी. अभी कुछ ही महीने पहले मैं यहां आया था, तब हम सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मना रहे थे. प्रथम विध्वंस के 1,000 वर्ष बाद भी सोमनाथ के अविनाशी होने का गर्व और आज इस आधुनिक स्वरूप की प्राण प्रतिष्ठा के 75 वर्ष, हम केवल 2 आयोजनों का हिस्सा भर नहीं बनें, हमें हजार वर्षों की अमृत यात्रा को अनुभव करने का शिवजी ने मौका दिया है.”
पीएम मोदी ने कहा, “75 साल पहले… आज के ही दिन सोमनाथ मंदिर की पुनर्स्थापना… ये कोई साधारण अवसर नहीं था. अगर 1947 में भारत आजाद हुआ था… तो, 1951 में सोमनाथ की प्राण प्रतिष्ठा ने… भारत की स्वतंत्र चेतना का उद्घोष किया था. आजादी के समय सरदार साहब ने 500 से ज्यादा रियासतों को जोड़कर एक भारत का स्वरूप गढ़ा था तो साथ ही सोमनाथ के पुनर्निर्माण से उन्होंने दुनिया को बताया था भारत केवल आजाद नहीं हुआ है, भारत अपने प्राचीन गौरव को पुनः हासिल करने के मार्ग पर भी अब आगे बढ़ चुका है.”

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अरब सागर के तट पर भव्यता के साथ सोमनाथ मंदिर
सरकार के आधिकारिक जानकारी के अनुसार, सोमनाथ को भगवान शिव के 12 आदि ज्योतिर्लिंगों में प्रथम के रूप में पूजा जाता है. वर्तमान मंदिर परिसर में गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप शामिल हैं, जो अरब सागर के तट पर भव्यता के साथ खड़े हैं. मंदिर के शिखर की ऊंचाई 150 फीट है, जिसके शीर्ष पर 10 टन भारी कलश स्थापित है. 27 फीट ऊंचा ध्वजदंड मंदिर की आध्यात्मिक उपस्थिति का प्रतीक है. पूरा परिसर 1,666 स्वर्ण-मंडित कलशों और 14,200 ध्वजाओं से सुसज्जित है, जो पीढ़ियों की भक्ति और उत्कृष्ट शिल्प कौशल का प्रतीक हैं.
